प्लाईवुड को एक सकारात्मक माहौल की आवश्यकता
- जुलाई 4, 2025
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एनजीटी ने रेजिन उत्पादन को लेकर जो नए आदेश दिए हैं, इसे आप किस तरह से देखते हैं?
एनजीटी का आदेश है कि चार टन से ऊपर का रेजिन प्लांट पर्यावरणिय मंजुरी (EC) लिए वगैर नहीं लगा सकते। 2006 से पहले के जो प्लांट है, वह चल सकते हैं, लेकिन नए प्लांट में दिक्कत आएगी। एनजीटी का यह आदेष प्लाईवुड उद्योग को काफी हद तक प्रभावित करेगा।
क्योंकि EC स्वीकृति प्राप्त करना बहुत मुश्किल हो सकता है। इसलिए, NGT को प्रत्येक प्लाईवुड फैक्ट्री को अपने निजी खपत के लिए, रेजिन केटल चलाने की अनुमति, वगैर EC के, दे देनी चाहिए। स्पष्ट तौर पर, उचित, प्रतिबंधक प्रदुषण नियंत्रण मानकों के साथ।

फैक्ट्रियों के आस पास के लोगों की प्रदूषण को लेकर तो शिकायत रहती है
हर फैक्ट्री संचालक की यह कोशिश रहती है कि, वह न सिर्फ प्रदूषण संबंधित, बल्कि सरकार की हर गाइड लाइन को मानते हुए काम करें। क्योंकि किसी भी इकाई को जब स्थापित किया जाता है तो करोड़ों रुपए लगते हैं। इसके साथ ही मेहनत व वक्त भी लगता है। संचालक विवादों के लिए व्यापार नहीं करता है। हर उद्योगपति विवादों से बचना चाहता है। क्योंकि उद्योगपति के पास इतना समय ही नहीं होता। वह काम करें या विवादों में पड़े।
इसलिए युनिट भी आमतौर पर आबादी से दूर स्थापित की जाती है। जहां इंडस्ट्रियल जोन नहीं है, वहां दूर दराज के इलाके में युनिट स्थापित करने की कोशिश रहती है।
अब जहां युनिट लगती है, वहां छोटे दुकानदार व अन्य तरह के काम करने वाले भी, आस पास आकर काम करना (और बसना) शुरू कर देते हैं। जोकि किसी भी फैक्टरी में जरूरत होती है।
धीरे धीरे फैक्टरी के आस पास आबादी बसनी शुरू हो जाती है। कुछ समय बाद जब यह आबादी अच्छी खासी हो जाती है, तो यही लोग प्रदूषण और अन्य तरह की शिकायत करनी शुरू कर देते हैं।
अब न चाहते हुए भी फैक्ट्री संचालक विवादों में आ जाता हैं।
इस तरह की परिस्थितियों में फैक्ट्री संचालक आखिर क्या करें? यह तो संभव है नहीं की वह अपनी युनिट कि फिर से हटा कर वहां ले जाए जहां आबादी नहीं हैं। ऐसे में रास्ता यह बचता है कि इन परिस्थितियों से समझौता करके ही काम चलाया जाए।
लेकिन कई बार लोग अवैध उगाही के लिए भी शिकायत करते हैं। वह जानबूझ कर ऐसे आरोप लगाना शुरू कर देते हैं, जिससे युनिट संचालक मुश्किल में आ जाए। इस तरह की कोशिश भी कई जगह होती रही है।

उद्योग का काम किस तरह से प्रभावित होता है
यमुनानगर का प्लाईवुड उद्योग इस वक्त कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है। कच्चे माल की कमी का समाधान हाल फिलहाल में नजर नहीं आ रहा है। लेबर की कमी आ रही है। इसके बाद प्रदूषण को लेकर जो परिस्थितियां बन रही है, कुल मिला कर इसमें काम करना मुश्किल हो रहा है। इससे होता यह है कि व्यापारी फिर पलायन करना शुरू कर देते हैं।
एक यूनिट भी यदि पलायन करती है या फिर बंद होती है तो, किसी न किसी स्तर पर हर किसी को प्रभावित करती है। बहुत से लोगों का रोजगार जाता है। सरकार को मिलने वाले राजस्व पर असर होता है। कृषि वानिकी कर रहे किसानों के लिए लकड़ी का एक खरीदार कम हो जाता है। जो दुकानदार वहां काम कर रहे हैं, वह प्रभावित होते हैं। ट्रक संचालक प्रभावित होते हैं।
कहने का भाव यह है कि किसी भी वजह से, युनिट के बंद होते ही इसका असर, किसी न किसी रूप में हर किसी पर पड़ना स्वाभाविक है। इन कई वजह से यमुनानगर में इस वक्त काम करना चुनौतिपूर्ण हो रहा है।

प्रदूषण मानकों व गाइडलाइन को लेकर आपकी राय क्या है?
प्रदूषण व इसके प्रभाव को समग्रता से समझना होगा। फैक्ट्री से निकलने वाले (काले या सफेद) धुएं का मतलब यह नहीं है कि वह हवा व वातावरण पर प्रतिकूल असर डाल रहा है।
धुएं से प्रदूषण न हो, इसके लिए हर युनिट संचालक सभी उपाय करते हुए आवश्क उपकरण लगाते हैं। हर मानक व गाइडलाइन का पालन किया जाता है। अब होता यह है कि आम आदमी समझता है कि स्वाभाविक तौर पर निकलने वाले काले या सफेद धुए से प्रदूषण हो रहा है। इसलिए वह शिकायत करना शुरू कर देते हैं। यदि हम फैक्टरी चला रहे हैं, तो हम भी तो उसी हवा में सांस ले रहे हैं। हमारे लिए अलग से हवा थोड़े आ रही है।
कई बार किसान प्रदूषण की समस्या को लेकर आते हैं कि उनकी फसल खराब हो गई। अब फसल क्यों खराब हुई, इसका आकलन कैसे किया जाए। बस उद्योग को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है।
टकराव से बचने के लिए कई बार उद्योगपति प्रभावित किसान को कुछ मुआवजा दे देते हैं। लेकिन इससे होता यह है कि इसमें ब्लैकमेलर सक्रिय हो जाते हैं। वह भी अवैध उगाही के लिए बार बार फिर शिकायत करना शुरू कर देते हैं।
उद्योग में मौजूद माहौल कैसे हैं
यमुनानगर के उद्योगपति बहुत उर्जावन जो हमेशा उत्साहित रहते हैं। इसीलिए यह शहर कई अवरोधो के बावजुद लकड़ी उत्पादों का महत्वूर्ण केंद्र बना हुआ है। और एषिया की सबसे बड़ी मंडी के रूप में इसको प्रसिद्धि मिली हुई है।
पिछले कुछ समय से, यह उद्योग कई तरह की परेशानियां झेल रहा है। कच्चे माल की कमी के अलावा विभिन्न सरकारी नियम कायदों ने उद्योग की गति को षिथिल कर दिया है।

उत्पादन लागत में कई गुना वृद्धि के कारण उद्योग का विकास अवरूद्ध हुआ है। उद्योगपतियों में निराशा छा रही है।
ऐसे में उद्योगपति निराश हो कर युनिट को स्थायी या अस्थायी तौर पर बंद करने की कोशिष करते है।
यूपी में प्लाइवुड उद्योगपति को यूनिट स्थापिज करने के लिए, न सिर्फ आमंत्रित किया जा रहा है, बल्कि सस्ती जमीन के साथ-साथ अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। यूपी सरकार प्लाइवुड उद्योग को बढ़ावा देने की काषिष कर रही है। इन हालात में यदि यमूनानगर से इंडस्ट्री पलायन कर उत्तर प्रदेष चली जाती है तो फिर जाहिर है, यमूनानगर पर तो इसका असर होगा ही, हरियाणा की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी।
प्रदूष की रोकथाम के लिए उद्योग क्या कर रहा है?
इस तथ्य को भी समझना चाहिए कि प्लाईवुड उद्योग अकेला ऐसा उद्योग है, जो हरियाली को बढ़ाने की दिशा में काम सक्रियता से कर रहा है। उद्योग पौधा रोपण पर जोर देता है। दूसरा एग्रोफोरेस्ट्री तभी सफल हो सकती है,जब लकड़ी को उचित बाजार मिले।
इसलिए प्लाईवुड उद्योग एग्रोफोरेस्ट्री को बढ़ाने की दिशा में भी सकारात्मक काम कर रहा है। लेकिन प्लाईवुड उद्योग की इस उपयोगिता की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कल्पना कीजिए एग्रोफोरेस्ट्री में तैयार लकडी की मांग कम हो जाती है, फिर क्या इतने बड़े पैमाने पर पौधा रोपण होगा?
जब पेड़ पौधे और हरियाली का विकास नहीं होगा, तो प्रदूषण का स्तर क्या होगा? इस तथ्य को समझता होगा। तभी सही तरह से यह आकलन हो सकता है, कि प्लाईवुड उद्योग प्रदूषण कम कर रहा है या फिर बढ़ा रहा है।
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