‘‘नेपाल से अनियंत्रित प्लाईवुड आयात भारतीय उद्योग को नुकसान पहुँचा सकता है‘‘
- अगस्त 5, 2025
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नेपाल से प्लाईवुड आयात को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं। आपकी क्या राय है?
हाँ, यह एक गंभीर चिंता का विषय है। नेपाल के पास बहुत कम बीआईएस लाइसेंस होने के बावजूद, वहाँ से भारत में आने वाले प्लाईवुड की मात्रा बढ़ रही है। अगर अनधिकृत प्लाईवुड बिना उचित जाँच के भारत में प्रवेश करता है, तो यह हमारे घरेलू उद्योग को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा सकता है। सभी आयातों को बीआईएस मानकों का पालन करना होगा, और सीमा पर कड़ी जाँच आवश्यक है। अन्यथा, यह भारतीय निर्माताओं के लिए एक बड़ा झटका होगा।
इस चिंता का आधार क्या है?
हाल ही में, FIPPI (भारतीय प्लाईवुड और पैनल उद्योग महासंघ) ने बीआईएस को पत्र लिखकर बताया कि नेपाल की केवल दो इकाइयों ने जनवरी से अप्रैल के बीच भारत को 135 ट्रक प्लाईवुड भेजा। चौंकाने वाली बात यह है कि अकेले मई में ही उन्होंने 590 ट्रक प्लाईवुड भेजे! इससे पता चलता है कि बीआईएस लाइसेंस का दुरुपयोग हो सकता है।

इस स्थिति में भारतीय प्लाइवुड निर्माताओं को क्या करना चाहिए?
हमें एकजुट होने की ज़रूरत है। यह किसी एक व्यक्ति या कंपनी की समस्या नहीं है, यह पूरे भारतीय प्लाइवुड उद्योग को प्रभावित करता है। FIPPI इस मुद्दे पर काम कर रहा है, लेकिन अन्य संघों को भी पहल करनी चाहिए। हमें अपने क्षेत्र के जोखिम को उजागर करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रियों से मिलना चाहिए। दिल्ली के समीपवर्त्ती राज्यों के निर्माता इस मुद्दे को सीधे दिल्ली में उठा सकते हैं, जबकि बिहार और अन्य राज्यों के उद्योगपतियों को अपने-अपने क्षेत्र के अधिकारियों से बात करनी चाहिए।
वियतनाम से आयात में कमी के साथ, क्या आप इसे भारतीय निर्माताओं के लिए एक अवसर के रूप में देखते हैं?
हाँ, यह एक अवसर है। बीआईएस अनिवार्य करने का उद्देश्य भी यही है कि हमारे प्लाईवुड उद्योग को मजबूती मिले। वियतनाम से तो आने वाली प्लाई लगभग बंद हो गई है। भारत में जिनके पास आयातित माल था, वह भी अब लगभग खत्म होने के कगार पर होगा। ऐसे में भारतीय प्लाइवुड की माँग बढ़ने की संभावना है।
हालाँकि, नेपाल से अनियंत्रित आयात इस अवसर को बर्बाद कर सकता है। हमें सतर्क और सक्रिय रहना चाहिए।
भारत में उन इकाइयों का क्या जिनके पास BIS लाइसेंस नहीं हैं?
यह एक और चिंता का विषय है। उत्तर भारत में लगभग 70-75 प्रतिशत इकाइयों के पास BIS लाइसेंस हैं, लेकिन बंगाल, बिहार और केरल में कई के पास नहीं हैं। अधिकारी उनके खिलाफ क्या कार्रवाई करेंगे? इस बारे में स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। यदि राजनीतिक दबाव की वजह से उनकी ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो लायसेंस धारक प्लाईवुड निर्माता के लिए यह मुश्किल वक्त हो जाएगा। अगर वे बीआईएस प्रमाणन के बिना काम करना जारी रखते हैं, तो लाइसेंस प्राप्त निर्माता जो पहले से ही बीआईएस अनुपालन के कारण उच्च उत्पादन लागत का सामना कर रहे हैं को नुकसान होगा।

क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी प्लाइवुड उद्योग के लिए चुनौतियाँ पैदा कर रहा है?
हाँ, प्रदूषण बोर्ड सख्त हो रहा है। वे उद्योगों से बॉयलरों और रेजिन केटल को आबादी वाले क्षेत्रों से बाहर स्थानांतरित करने के लिए कह रहे हैं। यह व्यावहारिक नहीं है। जब हमने अपनी फैक्ट्रियाँ स्थापित की थीं, तब आस-पास कोई आबादी नहीं थी। सरकार को उचित ज़ोनिंग सुनिश्चित करनी चाहिए थी। अब, हमें इसका परिणाम भुगतने के लिए विवश किया जा रहा है।
ऐसा लग रहा है कि अब इस माहौल में काम करना ही मुश्किल हो जाएगा। इसलिए हरियाणा और पंजाब के उद्योगपतियों को आपस में मिल कर बातचीत करनी चाहिए।
उद्योग इन संयुक्त चुनौतियों का कैसे जवाब दे सकता है?
हरियाणा, पंजाब और दिल्ली के साथ साथ उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान के प्लाइवुड निर्माताओं को एकजुट होकर राज्य और केंद्र, दोनों के अधिकारियों से बात करनी चाहिए। हम सभी समान समस्याओं का सामना कर रहे हैं। अब एक संयुक्त दृष्टिकोण अपनाने का समय आ गया है।

आपको क्या लगता है कि निर्माता पर्याप्त सक्रिय क्यों नहीं हैं?
दुर्भाग्य से, अधिकांश संघों में केवल अध्यक्ष और सचिव ही सक्रिय रहते हैं जबकि अन्य निष्क्रिय रहते हैं। आज के परिवेश में, हम सभी को अपने उद्योग की रक्षा के लिए सक्रिय और एकजुट होना चाहिए। तभी हम प्लाईवुड उद्योग के भले के लिए उचित माहौल बना सकते हैं। हम सभी को आपस में बातचीत करनी चाहिए। अधिकारियों व संबंधित एजेंसी और विभाग से तालमेल बिठाते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
प्रदूषण बोर्ड भी इकाइयों पर बाहर से रेजिन खरीदने का दबाव डाल रहा है। आपकी क्या राय है?
यह संभव ही नहीं है। पंजाब में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हमें संपूर्ण प्लाईवुड यूनिट के लिए प्रमाण पत्र दिए हैं, 2006 में एक निर्णय आया था कि जो ग्लू केटल इससे पहले की लगी हुई है, उन पर यह नियम लागू नहीं होगा।
वैसे भी केप्टिव कंजम्पसन वाली यूनिटों पर ऐसा कोई भी नियम लागू ही नहीं होना चाहिए। लेकिन अब NGT और प्रदूषण बोर्ड ने इस नियम पर प्रश्नचिन्ह् लगा दिया है। अब वह अपनी कार्यवाही के दायरे में सभी को लेकर आ रहे हैं। यह सही नहीं है। इससे दिक्कत आएगी। कोई बीच का रास्ता निकाला जाना चाहिए। जो इस गतिरोध का उचित हल निकाल सके।
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