शटरिंग प्लाईवुड में रिटेंशन जरूरी कर दिया गया है?

वास्तव में शटरिंग प्लाईवुड में रिटेंशन की जरूरत ही नहीं है। क्योंकि इस प्लाई का life span कितना हैं? यह प्लाई तो बहुत थोड़े समय के लिए, लगभग चार-छह महीने के लिए प्रयोग होती है। दस-पंद्रह या बीस बार। वह भी आउटडोर में।

इस तरह का ट्रिटमेंट तो उस प्लाई के साथ किया जाना चाहिए, जो लंबे समय के लिए उपयोग की जानी है, जैसे मरीन प्लाई। अब क्योंकि मरीन प्लाई को लंबे समय तक प्रयोग करना है, तो इसकी रिटेंशन ट्रीटमेंट भी होनी ही चाहिए।

फिलहाल, उद्योग के पास दूसरा विकल्प यह बचता है कि शटरिंग प्लाई को IS 303 BWP या BWR प्लाईवुड में मार्किंग और अंकित कर दिया जाए, तो इस बाध्यता से बचा जा सकता है। क्योंकि IS 303 में फेस की बाध्यता समाप्त कर दी गई है। और आप फिल्म फेस भी निर्विरोध इस्तेमाल कर सकते हैं।

BIS में प्लाई की इतनी श्रेणी बना दी, क्या इससे निर्माताओं के लिए स्थिति थोड़ी मुश्किल नहीं हो गई?

इतनी ज्यादा श्रेणी बनाने की आवश्यकता नहीं थी। श्रेणी कम होती तो ज्यादा ठीक रहता। अलबत्ता निर्माताओं को अब अपनी प्लाई की बोंडिंग पर ध्यान देना ही होगा।

सामान्यतः यदि बोंडिंग ठीक ठाक - एवरेज भी है तो कोई दिक्कत नहीं होगी। क्योंकि तब भी F 10 से F 30 तक की श्रेणी में आराम से पास हो जाएगा।

F 50 या इससे अधिक की आवश्यकता तो अधिकतम है, जिसे दक्ष और कार्यकुशल फैक्ट्रीयां बना सकती हैं। उद्योग सुरक्षा के लिहाज से नीचे की श्रेणी अंकित कर सकते हैं। अर्थात, अगर आप की प्लाई F 40 में पास हो रही है तो उसे F 30 में अंकित किया जा सकता है। यह एक सुरक्षित तरिका माना जा सकता है और इससे निर्माताओं की आषंकाएं दूर हो सकती है।

IS 303 की टेस्टिंग प्रक्रिया में क्या सब सही है?

पूरी तरह नहीं। MR प्लाई की टेस्टिंग में 60 डिग्री के तीन घंटे के तीन cycle की आवश्यकता थोड़ी कड़ी है। जनरल परपज प्लाईवुड की टेस्टिंग को 40 डिग्री या रूम तापमान और एक से दो घंटे तक सीमित होनी चाहिए। या 50 डिग्री कर दी जाए। क्योंकि राजस्थान जैसे प्रदेशों में गर्मी ज्यादा है वहां की गर्मी यह बर्दाश्त कर सकेंगे।

आखिरकार यह प्लाईवुड सामान्य प्रयोग के लिए ही तो है। विशेष उत्पादों पर मानक कड़े हों, तो वैसे निर्माता भी उसी अनुसार माल बनाएंगे।

लेकिन अब यह नियम बना दिया गया हैं, तो अब इसे मानना ही पड़ेगा। लेकिन अगली बार जब भी इसमें संशोधन होगा, तो जरूर इस बाबत आवाज उठाएगे।

रेजिन केटल पर NGT की कार्यवाही काफी मुश्किल भरी है?

NGT की इस कार्यवाही से, फैक्ट्रीयों को रेजिन आउट सोर्स करने के लिए उकसाया जा रहा है। जो हमारी व्यवसायिक गोपनीयता और गुणवत्ता के लिए चुनौती बन सकता है। हम राज्य सरकार से आग्रह कर रहे है कि उद्योग के प्रति सहानुभूति पूर्वक रवैया अपनाते हुए उद्योग को competitive वातावरण प्रदान किया जाए। अन्यथा, कच्चे माल की की कमी से जुझता हुआ उद्योग, गर्त में जा सकता है। जो सिर्फ रेजिन बनाने वाली इकाइयां है, हमें दिक्कत आएगी तो दिक्कत उन्हें भी आ सकती है।

रेजिन में अभी भी कृषि योग्य यूरिया का प्रयोग हो रहा है?

कृषि योग्य यूरिया और इंडस्ट्रीयल यूरिया की कीमतों में बहुत अंतर है। इसलिए कुछ निर्माता अभी भी कृषि योग्य यूरिया इस्तेमाल करते हैं। ऐसे उद्योग कृषि योग्य यूरिया और टेक्निकल यूरिया मिलाकर इस्तेमाल करते हैं। तो ऐसे में उनकी उत्पादन लागत कम हो जाती है। इस वजह से वह अपना उत्पाद सस्ता बेच देते है।

यूरिया की कीमतों के लिए कोई बीच का रास्ता तैयार किया जाना चाहिए। सरकार उद्योग को भी कुछ सब्सीडी दे और दोनों ग्रेड की कीमतों के अंतर को कम करे। आखिरकार, यह लुका छिपी का खेल समाप्त होना चाहिए। ताकि सभी उद्योगपति शान्त मन से अपने व्यवसाय की उन्नति पर ध्यान दें सकें।

रेजिन प्लांट बंद करने का नोटिस दिया गया है क्या?

हरियाना मे रेजिन प्लांट बंद करने का अभी तक कोई नोटिस नहीं दिया गया है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जो अनापत्ति प्रमाण पत्र दिए गए हैं, इसमें प्रायः सभी पुरानी इकाइयों के प्रमाण पत्रों में रेजिन प्लांट का जिक्र है। हरियाना मे रेजिन प्लांट बंद करने का अभी तक कोई नोटिस नहीं दिया गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कई उद्योग मे रेजिन प्लांट की उपस्थिति की जानकारी मांगी गई थी। कुछ फैक्ट्री संचालकों ने संभावित खतरे की आशंका में इससे इंकार कर दिया। मेरे अनुसार यह सही नहीं किया गया है। क्योंकि इससे अब वह बोर्ड के रिकॉर्ड में आ गए कि उनके पास रेजिन प्लांट नहीं है। यूं भी रेजिन प्लांट को लेकर हम सरकार से बात कर सकते हैं। और अपना पक्ष रख सकते है। जिससे बीच का रास्ता निकाला जा सकता था। लेकिन सीधे मना करने से शायद यह विकल्प खो दिया है।

तो क्या सरकार इस ओर कुछ ध्यान दे रही है?

सरकार प्लाईवुड उद्योग को लेकर गंभीर है। खासतौर पर जब से यूपी ने दूसरे राज्यों के प्लाईवुड निर्माताओं के लिए कई तरह की रियायत की घोषणा की है, हरियाणा सरकार प्लाईवुड निर्माताओं के साथ लगातार बातचीत कर रही है। हमने खुद जून में दो बार सीएम के राजनीतिक सलाहकार के साथ बैठक की है। जिसमें प्लाईवुड उद्योग में आ रही दिक्कतों से उन्हें अवगत कराया है। बिजली के बिल की समस्या को उठाया गया। इसके साथ ही हमारी जमीनों में जो अनअथोराइज लिखा जाता है, इससे हमें केंद्र के लाभ नहीं मिल पाते। ग्राउंड वाटर अथॉरिटी से भी समस्या आ रही है। हर साल रिन्यू कराना होता है। इस तरह की व्यवहारिक दिक्कत उनके सामने रखी है। हम सरकार के रुख से आशावान हैं और उम्मीद है हमें कुछ न कुछ रियायत तो जरूर मिलेगी।

निर्माताओं की बीआईएस में मांग है कि उन्हें फ्लस डोर व ब्लाक बोर्ड की टेस्टिंग में छूट चाहिए?

फ्लस डोर में एक इन्डेन्टेसन टेस्ट है कि आधा किलो की स्टील बाल को गिराई जाए तो 0.2mm से अधिक गहरा नहीं होना चाहिए। उद्योग द्वारा इस्तेमाल की जा रही कम उम्र की लकड़ी में, इसे achieve करना काफी मुश्किल है। हमने भी BIS से आग्रह किया था कि इस 0.2 को बढ़ाकार 0.5 या कम से कम 0.4 तक बढ़ाया जाना चाहिए। ऐसा करने पर उद्योग कुछ सुरक्षित महसूस करेगा। अन्यथा शायद उद्योग इस लायसेंस को सरेंडर करना ना शुरू कर दे।

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माइक्रो प्लाईवुड निर्माता के लिए भी क्यूसीओ की तारीख नजदीक आ रही हैं?

माइक्रो को एक साल का और अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए। इसकी वजह यह है कि अभी सभी ने लाइसेंस नहीं लिया हैं।

इस समस्या का समाधान यही है कि उत्पाद तय मानकों के अनुरूप हो, कैसे हो रहा है, यह चिंता निर्माता पर छोड़ देनी चाहिए।

अनिवार्य प्रयोगशाला की बजाय यह छूट मिलनी चाहिए कि अपने उत्पाद का टेस्ट कही से भी कराए, बस उत्पाद मानकों के अनुसार होना चाहिए। यदि यह व्यवस्था हो जाए, तो फिर काफी दिक्कत दूर हो जाएगी। BIS अधिकारी या विशेषज्ञ को उत्पाद पर ही ध्यान देना चाहिए। उद्योग कैसे यह गुणवत्ता प्राप्त कर रहा है, यह वह स्वयं तय करें।

हां, फिर निर्माता को विशेष ध्यान देना होगा कि उसके उत्पादन परिसर में F 10 से निचे का कोई उत्पाद नहीं होना चाहिए।

रिजेक्शन को लेकर क्या रुख अपना रहे हैं?

रिजेक्शन बड़ा मुद्दा है। प्लाईवुड को रिसाइकिल तो कर ही नहीं सकते। उद्योग के अनुसार यह दो से दस प्रतिशत तक होना चाहिए जिसे रिजेक्टेड के अनुसार बेचने की स्वीकृति मिलनी चाहिए। इस बाबत IWST बैंगलोर से जवाब दिया गया कि यह पॉलिसी मैटर है। इस बाबत DPIIT को लिखा जाना चाहिए।

इस मुददे् पर तुरंत ही आवाज उठायी जानी चाहिए। अगस्त में जब क्यूसीओ पूरी तरह लागू हो तो उससे पहले इस समस्या का कोई न कोई हल निकल सकता है। इसके लिए सभी एसोसिएशन को सक्रिय होना होगा।

केरल में तो विभाग ने सख्त कदम उठा कर संदेश दिया हैं कि अब समय सीमा में रियायत नहीं दिया जाएगा?

यह सही है, केरल में गैर लाइसेंसी पार्टिकल बोर्ड व प्लाईवुड की फैक्ट्री बंद कर दी है। केरल के अलाव बिहार और पश्चिम बंगाल में भी आईएसआई के लाइसेंस कम है।

फैक्ट्री सील करने की कार्यवाही से विभाग ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि ऐसा दुसरों के साथ भी हो सकता है। यह विभाग का सख्ती दिखाने का तरीका हो सकता है।

हालांकि एक तर्क दिया जा सकता है, कि भारत में बिना आईएस आई का माल बेचा नहीं जा सकता, लेकिन शायद इसके निर्माण में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। हम निर्यात के लिए भी तो माल बना ही सकते हैं। यह कानूनन प्वाइंट तो बन सकता है। लेकिन यह प्वाइंट जमीन पर कितना व्यवहारिक साबित होगा, यह तो समय ही बताएगा।

कुछ प्लाईवुड संस्थानों पर जीएसटी की रेड पडी है?

कोई भी निर्माता नियमों को तोड़ना नहीं चाहता। लेकिन समस्या तब आती है, जब उसे नियम तोड़ने पर बाध्य किया जाए। इस समस्या का एक ही समाधान हो सकता है, वह यह है कि टैक्स कम कर दिया जाए। यदि टैक्स 18 से 5 कर दिया जाए, तो यह समस्या अपने आप दूर हो जाएगी। इस ओर सरकार को ध्यान देना चाहिए। जीएसटी यदि कम होगी तो कोई भी टैक्स चोरी नहीं करना चाहेगा।

हांलाकि वर्तमान परिस्थितियों में उद्योग को संयत होकर व्यवसाय करना चाहिए। एक तो उचित दरों पर माल बेचना मुश्किल हो रहा है, उपर से इस तरह की एकमुश्त जुर्माने के बोझ से युनिट को तो उबरने का कोई मौका ही नहीं मिलेगा।

जो एक दो प्रतिशत उद्योगपति इस तरह का उच्छुंखल आचरण करते हैं, उनसे संपूर्ण उद्योग प्रभावित होता है।


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