देश में दिग्गज मगर वैश्विक पहचान शून्य
- सितम्बर 19, 2025
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भारत में एक बहस यह भी छिड़ी हुई है कि देश वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बने रहने के लिए क्या कदम उठा रहा है।
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने गौर किया, कि भारत का 1.4 अरब लोगों का मजबूत घरेलू बाजार एक सहज एवं आरामदेह क्षेत्र बन गया है। और भारतीय उद्योग जगत को मोटा मुनाफा भी दे रहा है इसलिए उन्हें दुनिया में अवसरों की तलाश में निकलने की जरूरत महसूस नहीं होती है।
1991 के आर्थिक सुधारों से पूर्व की व्यावसायिक नीतियों से, भारतीय उद्योग जो भी उत्पादन करते थे, वे उपभोक्ताओं के पास अधिक विकल्प नहीं होने के कारण हाथोंहाथ बिक जाते थे।
इसलिए, भारत में जो समूह शुरू में अपना कारोबार एवं आकार बढ़ाने लिए एक क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित कर रहे थे, उन्हें भी दूसरे भिन्न क्षेत्रों में विस्तार करने में सहजता महसूस हुई। ऐसा लगता है कि अभी भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ हैं।
यह बात कुछ हद तक स्पष्ट करती है कि हमारे पास एक या दो क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाली विशाल कंपनियों के बजाय इतने सारे भारतीय कंपनी समूह क्यों हैं।
कुछ दोष बड़े भारतीय उद्योग समूहों पर लगाए जा सकते हैं, जिन्होंने अपने आकार और संसाधनों के बावजूद वैश्विक स्तर पर धाक जमाने का लक्ष्य साधने के बजाय, घरेलू बाजार का प्रबंधन करना पसंद किया। मगर सरकार को भी इस पर विचार करने की आवश्यकता है कि उसकी नीतियों में कहां कमी रह गईं।
जिन अधिकतर देशों को हम निर्यात करते हैं वहां बेची जाने वाले उत्पादों की गुणवत्ता अक्सर भारत में मिलने वाले उत्पादों से अधिक होती है, जबकि भारतीय उपभोक्ता घर पर उसी उत्पाद के लिए अधिक भुगतान करते हैं।
भारत में काम करने वाली वैश्विक कंपनियां भी अक्सर विदेश में और घरेलू बाजार में जो सामान बेचती हैं, उनकी गुणवत्ता में फर्क रखती हैं।
1980 के दशक में जब चीन अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार कर रहा था, तो चीन ने जबरदस्त घरेलू प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा दिया लेकिन साथ-साथ गुणवत्ता का स्तर भी बढ़ाता रहा। इससे चीन में उन कंपनियों को बढ़ावा मिला जो वाकई मजबूत थीं। उत्पादन लागत कम रखने पर ध्यान केंद्रित करने के उपायों के साथ, वैश्विक स्तर की गुणवत्ता निखर कर सामने आई।
चीन सरकार ने घरेलू कंपनियों के हितों की रक्षा और प्रोत्साहन के लिए, कुछ नीतियों के साथ उनकी मदद की, लेकिन उन्हें वैश्विक और घरेलू स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बने रहने के लिए भी विवश किया।
शायद भारतीय नीति निर्माताओं के साथ-साथ, औद्योगिक संगठनों को इस मुद्दे पर भी बहस करनी चाहिए।
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