महामारी से उथलपुथल मचने के बाद केंद्र सरकार ने पूंजीगत व्यय काफी बढ़ा दिया। इस निवेश ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मांग बढ़ाने का काम बखूबी किया मगर यह भी माना गया था कि कभी न कभी निजी क्षेत्र निवेश का जिम्मा अपने हाथ में लेगा और वृद्धि बरकरार रहेगी।

हालांकि महामारी से तो हम बहुत तेजी से उबर गए मगर निजी निवेश में इजाफा सुस्त ही रहा है। ध्यान रहे कि महामारी से पहले भी निजी निवेश धीमा ही था। वैश्विक वित्तीय संकट के बाद कंपनियों और बैंकों दोनों की बैलेंस शीट बहुत खस्ता हो गई थीं। हालांकि अब यह दिक्कत पूरी तरह दूर हो चुकी है और कंपनियों तथा बैंको की बैलेंस शीट अच्छी स्थिति में हैं। किंतु निजी क्षेत्र अब भी निवेश करने में संकोची है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निजी कंपनियों से कहा कि उन्हें मूक दर्शक नहीं बने रहना है। उन्होने कंपनियों से मौके पहचानने और चुनौतियाँ स्वीकारने के लिए आह्वान किया। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि निजी क्षेत्र को बताना चाहिए कि उन्हे निवेश बढ़ाने से क्या बात रोक रही है।

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सरकार बुनियादी ढंाचा सुधारने के लिए भारी खर्च के साथ ही निवेश बढ़ाने में आ रही बाधाओं को सरलीकरण करने के प्रयास भी कर रही है। उदाहरण के लिए 2014 के बाद से अब तक उसने 42,000 से अधिक नियम-कायदे हटा दिए हैं। 3,700 से अधिक कानूनी प्रावधानों को फौजदारी से बाहर कर दिया गया है और आगे भी सरकार की ओर से ऐसे प्रयास जारी रहेंगे।

भारतीय कंपनियों के निवेश नहीं करने की कई वजह हो सकती हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकडे़ बताते हैं कि विनिर्माण क्षेत्र में 75 फीसदी क्षमता का इस्तेमाल हो रहा है, जो लंबे अरसे के औसत से कुछ ही ज्यादा है। आम तौर पर कंपनियां इसी स्तर से क्षमता बढ़ाने के लिए नया निवेश करने की सोचती हैं।

लेकिन उनकी अनिच्छा की दो बडी वजहें हो सकती हैं। पहली, अनिश्चितता भरा वैश्विक माहौल, जिसमें डॅानल्ड ट्रंप के अमेरिका राष्ट्रपति बनने के बाद इजाफा ही हुआ है। दूसरी, चीन में आवश्यकता से अधिक उत्पादन क्षमता होना, जिसके कारण भारतीय कंपनियों के लिए निर्यात बढा़ने की संभावना घट जाती है।

निवेश और कुल वृद्धि में कमजोरी को निर्यात की सुस्ती से समझा जा सकता है।


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