बिजली क्षेत्र के सुधारों को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने विद्युत अधिनियम में ऐतिहासिक संशोधन का प्रस्ताव रखा है। इसमें अनिवार्य लागत-प्रतिबिंबित शुल्क लागू करने, उद्योगों के लिए बिजली की ऊंची दरों को कम करने और रेलवे प्रणालियों तथा विनिर्माण कंपनियों को क्रॉस-सब्सिडी के बोझ से छूट प्रदान करने का प्रस्ताव है।

अधिनियम में संशोधन का उद्देश्य मजबूत और दूरदर्शी कानूनी ढांचा तैयार करना है जो 6.9 लाख करोड़ रुपये से अधिक के घाटे का सामना कर रही बिजली वितरण कंपनियों के वित्तीय दबाव को दूर करेगा, उच्च औद्योगिक शुल्कों पर लगाम लगाएगा तथा स्वच्छ ऊर्जा अपनाए जाने को बढ़ावा देगा।

बिजली मंत्रालय के विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025 के मसौदे में कहा गया है, कि, राज्य सरकारों के लिए विशिष्ट उपभोक्ता श्रेणियों को अग्रिम सब्सिडी देने की सुविधा जारी रहेगी ताकि किसी भी उपभोक्ता समूह पर अनुचित बोझ न पड़े।

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सार्वजनिक परामर्श के लिए आज जारी किए गए मसौदा विधेयक में राज्य विद्युत नियामक आयोगों को स्वतः संज्ञान पर शुल्क निर्धारित करने का अधिकार देने का भी प्रस्ताव है। इसमें यह सुनिश्चित किया जाएगा कि संशोधित दरें प्रत्येक वित्त वर्ष की 1 अप्रैल से लागू किए जाएं, जिससे बिजली क्षेत्र में समग्र वित्तीय अनुशासन में सुधार होगा।

विधेयक में कहा गया है कि उच्च औद्योगिक शुल्क, क्रॉस-सब्सिडी और बिजली की बढ़ती खरीद लागत ने भारतीय उद्योग, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उपक्रमों की प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर कर दिया है। इसमें कहा गया है, प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य बिजली की दरों को युक्तिसंगत बनाना, मांग में तेजी लाना और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना है, जिससे भारत की आर्थिक उत्पादकता को सुदृढ़ बनाया जा सके।

भारतीय रेलवे और मेट्रो रेल प्रणालियों के लिए बिजली की दर में क्रॉस-सब्सिडी और अधिभार लगता है इससे यह और महंगा हो जाता है। इसकी वजह से मालवहन और लोगों के परिवहन की लागत बढ़ जाती है। ये उच्च लागतें अंततः पूरी अर्थव्यव्स्था में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत बढ़ाती हैं।


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