अगर स्टील से लेकर मोबाइल कवर, कांच, पीईटी और सोलर पैनल तक हर चीज को संरक्षण की आवश्यकता है, जबकि सैकड़ों अन्य उत्पादों को पहले ही किसी न किसी तरह का संरक्षण हासिल है तो ऐसे में हमें खुद से एक गहरा प्रश्न करना होगा और वह यह कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? और हम इसे कैसे बदल सकते हैं?

यह भी सच है कि चीन ने अपना भारी सब्सिडी और उच्च सरंक्षण वाला औद्योगिक उत्पादन भारत पर थोप दिया है। ये उत्पाद बहुत आसानी से घरेलू उत्पादन और उद्योग पर छा जाते हैं और रोजगार तथा दीर्घकालिक विनिर्माण वृद्धि को प्रभावित करते हैं।

भारतीय विनिर्माता और उनके संघ मानते हैं कि उन्हें दुनिया भर के उत्पादों से संरक्षण की आवश्यकता है। यह भी माना जाता है कि अन्य देशों के उत्पादकों को सस्ते चीनी कच्चे माल से लाभ मिल रहा है और इसके चलते अंतिम उत्पाद की लागत कम रहती है। ऐसे में भारत को खुद को इन सभी देशों के उत्पादकों से बचाने की आवश्यकता है जो सस्ते चीनी कच्चे माल पर निर्भर हैं।

लेकिन यह भी सही है कि भारत खुद भी चीन से बहुत अधिक आयात करता है। गत वर्ष यह आंकड़ा 113 अरब डॉलर था जो इससे पिछले वर्ष से 11 फीसदी अधिक था।

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अब सरकार के सामने एक गंभीर समस्या हैः वह यह कैसे तय करे कि किन उत्पादों को बचाना है और किन्हें नहीं? अपना हित चाहने वाला हर उत्पादक सरकार से चाहेगा कि वह उसे आयात से संरक्षण दिलाए।

यह सवाल पूछना जरूरी हैः ऐसे कौन से मानदंड हो सकते हैं जो सरकार को यह तय करने में मदद करें कि किन उत्पादों को किसी न किसी रूप में सरंक्षण दिया जाना चाहिए, और किन्हें बिना रोक-टोक, या मामूली शुल्क के साथ, आयात की अनुमति दी जानी चाहिए?

संरक्षण एक तरह का आर्थिक न्याय है और निर्णय देने के पहले सरकार को सभी उत्पादकों और उपयोगकर्ताओं को समुचित अवसर देना चाहिए। क्योंकि, सरकार को उपयोगकर्ताओं का भी वैसा ही बचाव करना होता है जैसे वह उत्पादकों का करती है।

भारत के विनिर्माण क्षेत्र को सहारा देने और बढ़ावा देने के कई तरीके हैं। एक तरीका है कुछ लागतों को वहन करना, दूसरा है सब्सिडी प्रदान करना, तीसरा है व्यापार करने की प्रक्रिया को सरल बनाना, और एक अन्य तरीका है संरक्षणवाद अपनाना। इन सभी उपायों के अपने-अपने फायदे और नुकसान हैं।

यद्यपि संरक्षणवाद कुछ लोगों को दूसरों की कीमत पर लाभ पहुंचाता है, प्रतिस्पर्धी ताकतों को कम करता है, निर्भरता पैदा करता है, और उद्योग द्वारा लॉबिंग व राजनीतिक दबाव को बढ़ावा देता है। इसलिए, संरक्षणवादी उपायों का उपयोग बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए।

संरक्षण सरकार पर निर्भरता की और ले जाता है। जो भारत की दीर्घकालिक वृद्धि पर असर डालती है। ऐसे में फिर चाहे गुणवत्ता नियंत्रण आदेश हो, सामान्य से अधिक शुल्क दर या एंटी-डंपिंग उपाय, ऐसे सभी उपायों की एक समापन अवधि होनी चाहिए।

 

सुरेश बाहेती
9050800888

 

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