स्वदेशी के बाजार तकनीक आयात को प्राथमिकता देता उद्योग
- मई 8, 2026
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जोएल मोकिर, अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता जोएल मोकिर की दलील है कि समाज तब फलते-फूलते हैं जब वे उपयोगी ज्ञान का पोषण करते हैं, उसका विकास करते हैं और उसे प्रसारित करते हैं।
क्या भारत मोकिर द्वारा दिए गए आर्थिक प्रगति के खाके से कुछ सीख सकता है?
मोकिर का कहना है कि 18वीं सदी में यूरोप का बदलाव तीन अंतर्संबंधित संस्थानों पर केंद्रित थी- प्रस्तावनात्मक ज्ञान (विज्ञान और सिद्धांत) का निर्माण, उसका तकनीक और अभियांत्रिकी में रूपांतरण और एक ऐसा नेटवर्क जो इन दोनों के बीच विचारों के मुक्त प्रवाह को संभव बनाता है।
आधुनिक चीन ने असाधारण गति से इसका अपना संस्करण तैयार किया है। उसका शोध एवं विकास व्यय उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.5 फीसदी से अधिक है, उसकी पेटेंट फाइलिंग का आंकड़ा किसी भी अन्य देश से अधिक है और उसके विश्वविद्यालयों से हर वर्ष हजारों की तादाद में इंजीनियर और वैज्ञानिक निकलते हैं।
भारत का वैज्ञानिक अभिजात वर्ग भी विश्वस्तरीय है, लेकिन प्रयोगशाला और फैक्ट्री के बीच की कड़ी कमजोर बनी हुई है। देश अपने जीडीपी का केवल 0.7 फीसदी शोध एवं विकास पर खर्च करता है, जो चीन की तुलना में एक तिहाई है। इसका अधिकांश हिस्सा सरकारी क्षेत्र से आता है।
भारतीय विश्वविद्यालय शिक्षण में मजबूत हैं, लेकिन शोध में कमजोर हैं और उद्योग जगत तकनीक को आयातित करने को प्राथकिता देता है बजाय कि उसे अपनाने या विकसित करने के। इसका परिणाम एक ऐसी अर्थव्यवस्था में सामने आता है, जो मानव संसाधन के मामले में तो अर्थ समृद्ध है, लेकिन तकनीकी क्षमता में नहीं।
वर्ष 2025 में भारत ने विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित में उतने ही स्नातक तैयार किए जितने कि चीन ने लेकिन उनमें से अधिकांश सॉफ्टवेयर सेवाओं में चले गए। हमारे यहां स्नातकोत्तर और डॉक्टोरल स्तर पर इनकी संख्या काफी कम है, जबकि मूल शोध उन्हीं जगहों पर होता है।
क्षेत्र के शोध एवं विकास को प्रोत्साहित करना भी उतना ही आवश्यक है। फिलहाल बड़ी भारतीय कंपनियां अपनी बिक्री का केवल 0.2 से 0.3 फीसदी हिस्सा ही शोध पर व्यय करती हैं, जो वैश्विक मानकों से बेहद कम है। कर प्रोत्साहन, लक्षित सरकारी खरीद और पीपीपी से हालात बदल सकते हैं।
रक्षा शोध एवं विकास संगठन तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने दिखाया है कि कैसे सरकारी मिशन के साथ आपूर्तिकर्ता और इंजीनियर तैयार किए जा सकते हैं। असल चुनौती है इस मॉडल को असैन्य क्षेत्रों (भारतीय उद्योगों) में दोहराना।
हमारे पास प्रतिभा है, उद्यमशील ऊर्जा है और तेज विकास की क्षमता रखने वाला घरेलू बाजार भी है। लेकिन जो कमी है वह एक ऐसी प्रणाली की है जो स्वयं ज्ञान पर आधारित होकर इसे निरंतर विकसित होने दे।
यह सब तब तक असंभव है जब तक एक ऐसी संस्कृति विकसित न हो जो उपयोगी ज्ञान और अनुसंधानकत्ता का सम्मान करे और उसका उत्सव मनाए।
Suresh Bahety | 9050800888
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