भविष्य की सटीक भविष्यवाणी कोई नहीं कर सकता क्योंकि पिछली आर्थिक या बाजार संबंधी संकटों से हुई रिकवरी इस बात की गारंटी नहीं देती कि इस बार भी परिणाम वैसा ही होगा। फिर भी इतिहास एक उपयोगी मार्गदर्शक होता है, विशेष रूप से तब जब उसे अनिश्चित परिस्थितियों के लिए तैयार की गई एक मजबूत वित्तीय योजना के साथ जोड़ा जाए।

किसी भी उद्योगपति और निवेशक की योजना लंबी समयावधि के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बनाई जानी चाहिए, न कि हर वर्ष अधिकतम रिटर्न कमाने के लिए। एक मैराथन धावक की तरह, जो हर किलोमीटर जीतने के लिए पूरी ताकत से नहीं दौड़ता। उसकी गति उस दूरी के अनुसार तय होती है जिसे उसे पूरा करना है। जिन निवेशकों के पास ऐसी स्पष्ट योजना नहीं होती, वे स्वाभाविक रूप से बाजार के हर संकेत पर अपनी प्रतिक्रिया देने लगते है।

हालांकि युद्ध, ऊर्जा और शिपिंग जोखिमों के बावजूद वार्षिक उतार-चढ़ाव सामान्य है और यह किसी मंदी वाले बाजार की स्थिति नहीं है। यहां से हालात और बिगड़ भी सकते हैं, लेकिन यदि थोड़ी भी सकारात्मक प्रगति होती है तो पूर्ण सामान्य स्थिति लौटने से पहले ही बाजार में सुधार शुरू हो सकता है। लेकिन इनमें से क्या होगा, यह कोई नहीं जानता।

कोविड महामारी इस अनिश्चितता का एक अच्छा उदाहरण है। कोविड के पहले दौर में संपूर्ण औद्योगिक और व्यापारिक बंदी के बावजूद बाजार पूरी तरह संभल गया और नए उच्च स्तर पर पहुंच गया, जबकि उस समय तक वैक्सीन उपलब्ध भी नहीं थी। इसके बाद अप्रैल 2021 में कोविड की दूसरी और अधिक घातक लहर आने के बावजूद बाजार आगे बढ़ता रहा। इससे एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि केवल दिखाई देने वाले संकट के आधार पर बाजार की प्रतिक्रिया का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

वर्तमान संकट अलग प्रकार का है। बुनियादी ढांचे को होने वाला नुकसान महामारी से उत्पन्न व्यवधानों से भिन्न होता है। यह भौतिक नुकसान होता है और इसकी भरपाई में अधिक समय लगता है।

कई बार संकट कठिन लेकिन आवश्यक सुधारों का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। उदाहरण के लिए, भारत के 1991 के विदेशी मुद्रा संकट ने आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की, जिसने देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया।

2020 के विपरीत, आज सोशल मीडिया की भूमिका कहीं अधिक बड़ी हो गई है। यह हर संकट के साथ चिंता की एक अतिरिक्त परत जोड़ देता है। एल्गोरिदम किसी व्यक्ति की शुरुआती आशंकाओं को पहचानकर उसे उसी प्रकार की और सामग्री दिखाते रहते हैं, जिससे संकट वास्तविकता से अधिक बड़ा और निश्चित प्रतीत होने लगता है।

सच यह है कि अनुशासन का सिद्धांत सरल है, लेकिन उसका पालन करना आसान नहीं है।

अधिकांश संकटों में केवल दो में से एक प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है- यदि आवश्यक हो तो अपने कामकाजी तरीके का पूर्नमूल्यांकन या पुनर्संतुलन करें, अन्यथा धैर्य बनाए रखें और समय को अपना काम करने दें।

 

सुरेश बाहेती

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