FIPPI द्वारा नई वन नीति के समर्थन के लिए छत्तीसगढ़ के PCCF से संपर्क
- अप्रैल 8, 2026
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भारत सरकार ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार प्रस्तुत किया है, जो देश के लकड़ी आधारित उद्योगों के भविष्य को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है। जनवरी 2026 के इस संशोधन में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 29 नवंबर 2023 को अधिसूचित समेकित दिशानिर्देशों के पैरा 7.2 के अंतर्गत वन भूमि को पट्टे पर देने से संबंधित प्रावधानों में संशोधन करते हुए विनियमित ढांचे के तहत अवनत (degraded) वन भूमि पर रोपण गतिविधियों में निजी संस्थाओं की भागीदारी को अनुमति दी है।
इस पहल का उद्देश्य वैज्ञानिक वन प्रबंधन को मजबूत करना, अवनत वन क्षेत्रों का पुनरुद्धार करना और लकड़ी आधारित उद्योगों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता को बढ़ाना है।
संशोधित ढांचे के अनुसार राज्य सरकारें निजी संस्थाओं, उद्योगों और प्लांटेशन कंपनियों के सहयोग से सहायक प्राकृतिक पुनर्जनन (Assisted Natural Regeneration) और रोपण गतिविधियाँ कर सकती हैं। ये गतिविधियाँ वानिकी कार्यों के रूप में ही मानी जाएंगी और राज्य वन विभागों की निगरानी में संचालित होंगी।
नीति के अनुसार ऐसे रोपण कार्य स्वीकृत वर्किंग प्लान के अनुसार किए जाएंगे और इनके लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (Detailed Project Report – DPR) तैयार किया जाएगा, जिसमें क्षेत्र, प्रजातियों की संरचना, सिल्वीकल्चर पद्धतियाँ और सतत कटाई चक्र का उल्लेख होगा।
महत्वपूर्ण बात यह है कि दिशानिर्देश स्पष्ट करते हैं कि यदि ये रोपण गतिविधियाँ राज्य वन विभाग की निगरानी में वानिकी कार्यों के रूप में की जाती हैं, तो इनके लिए प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) और नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) का भुगतान लागू नहीं होगा।
ये दिशानिर्देश राज्य सरकारों को निजी भागीदारी के साथ रोपण परियोजनाओं को लागू करने के लिए उपयुक्त ढांचा तैयार करने में लचीलापन प्रदान करते हैं।
फेडरेशन ऑफ इंडियन प्लाइवुड एंड पैनल इंडस्ट्री (FIPPI) ने इस पहल का स्वागत किया है और इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए अपना समर्थन व्यक्त किया है। छत्तीसगढ़ के प्रधान मुख्य वन संरक्षक को भेजे गए एक पत्र में महासंघ ने बताया कि इस प्रकार की नीतियाँ प्लाइवुड और पैनल उद्योगों के लिए घरेलू लकड़ी आपूर्ति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
इसके लिए FIPPI द्वारा दो प्रमुख कार्यान्वयन मॉडल सुझाए गए हैं।
विकल्प 1: राजस्व साझेदारी मॉडल
इस मॉडल के अंतर्गत राज्य वन विकास निगम रोपण गतिविधियों के कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में कार्य करेगा। निगम निजी संस्थाओं के साथ मिलकर विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन तैयार करेगा और परियोजना को लागू करेगा।
परियोजना के लिए वित्तीय निवेश निगम और निजी भागीदार के बीच साझा किया जा सकता है, और रोपण से प्राप्त उत्पाद को निवेश अनुपात के आधार पर बांटा जाएगा। निगम अपने हिस्से के उत्पाद के विपणन का उत्तरदायित्व निभाएगा, जबकि निजी भागीदार के लिए न्यूनतम संकेतक मूल्य निर्धारित किया जा सकता है।
इन परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देने के लिए NABARD जैसे संस्थान भी सहयोग कर सकते हैं।
विकल्प 2: उद्योग भागीदारी मॉडल
दूसरे मॉडल में वन विभाग द्वारा खुले या कम घनत्व वाले अवनत वन क्षेत्रों की पहचान की जाएगी, जहाँ रोपण गतिविधियाँ की जा सकें।
इसके बाद भागीदारी करने वाले उद्योगों के साथ मिलकर विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन तैयार किया जाएगा। स्वीकृत वर्किंग प्लान के अनुसार मेलिया डुबिया, एकेशिया मैंगियम और यूकेलिप्टस जैसी उपयुक्त प्रजातियों का रोपण किया जा सकता है।
इन परियोजनाओं में सहायक प्राकृतिक पुनर्जनन, मिट्टी और नमी संरक्षण, अग्नि सुरक्षा उपाय तथा वर्किंग प्लान चक्र के अनुरूप सतत कटाई प्रणाली भी शामिल होगी।
भाग लेने वाली एजेंसी वन विभाग की निगरानी में इन रोपण गतिविधियों का क्रियान्वयन करेगी।
उद्योग प्रतिनिधियों का मानना है कि अवनत वन भूमि पर वैज्ञानिक तरीके से रोपण की अनुमति देने से कच्चे माल की उपलब्धता में सुधार होगा और साथ ही पारिस्थितिक पुनर्स्थापन को भी बढ़ावा मिलेगा।
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