भारत में जमीन का व्यवसायिक इस्तेमाल करने की प्रक्रिया हमेशा से ही कष्टकारी रही है। जमीन की लगातार कमी हो रही है, इस वजह से स्थिति बदतर होती जा रही है। 2050 तक, भारत दुनिया के उन देशों में शामिल हो जाएगा, जहां व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए जमीन मिलना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

जमीन की इस किल्लत की तीन सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियां जिम्मेदार है।

  1. भारत में भूमि के उपयोग से उतना लाभ नहीं होता। जितना असमान विकास से अभाव पैदा कर, ज्यादा से ज्यादा किराया वसूला जाने पर।

भूमि के उपयोग में यदि बदलाव किया जाए तो यह वहां की भौगोलिक परिस्थितियों और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इससे लोगों को अधिक से अधिक लाभ मिलना चाहिए। उत्पादक कार्यकलापों से लाभ लेने की बजाए, जमीन का अभाव पैदा कर कमाने की कोशिस अधिक होती है।

जब मुंबई में कपड़ा मिलें और विनिर्माण इकाइयाँ बंद हो गईं, तब ऐसे दिवालिया पुश्तैनी उद्योगपतियों के माफिया गिरोह ने कमजोर होती आर्थिक स्थिति का फायदा उठाते हुए महंगे वाणिज्यिक और आवासीय निर्माण कर दिए।

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ऐसे ही कई शहरों में कृषि योग्य जमीन को गैर कृषि जमीन की श्रेणी में अधिसूचित कर दिया गया, ताकि बिल्डर और कॉलोनाइजर उच्च-स्तरीय आवास बना सकें। उन्हें जमीन सस्ते दाम पर मिले, इसके लिए 1991 के बाद, को आपरेटिंग सोसाइटी बनाने के नाम पर राज्य द्वारा सब्सिडी दी गई थी जिन्हें बाद में बिल्डरों को बेच दिया गया।

जब एक आर्थिक परियोजना में, दुर्लभ संसाधनों का प्रयोग केवल और केवल कुछ खास लोगों को पहुंचाने की सोच रहेगी, तब तक असमानता बढ़ती रहेगी। इस तरह की योजना अपने उद्देश्य से भटकने के लिए अभिशप्त है।

  1. राज्य के पास भूमि का सबसे बड़ा मालिकाना हक है। सरकारी भूमि राज्य की विभिन्न इकाइयों के बीच बंटी हुई है। इस वजह से सरकार को भूमि अधिग्रहण पर बहुत समय और प्रयास खर्च करना पड़ता है। स्थिति का दूसरा पहलु यह भी है कि भारत के हर प्रमुख शहर में इन शहरों को पाँच वर्षों में झुग्गी-झोपड़ी मुक्त बनाने के लिए पर्याप्त सरकारी भूमि है।

भारत सरकार के पास जमीन का सबसे बड़ा मालिकाना हक होने के बाद भी सरकार इस जमीन को बेहतर इस्तेमाल करने से चूक रही है। वह अपनी जमीनों को सही तरीके से उपयोग करने में विफल साबित हो रही है।

  1. किसी भी देश की आबादी उस राष्ट्र का प्राकृतिक संसाधन हैं, जिसमें भूमि भी शामिल है, जो समुदायों द्वारा साझा की जाती है और किसी के स्वामित्व में नहीं होती है। सरकार कॉमन्स के संरक्षक और नियामक के रूप में कार्य करती है।

पर्यावरण संबंधी बढ़ती चिंताओं के कारण, अब हर किसी का ध्यान आम लोगों की ओर आकर्षित हो रहा है, लेकिन भारत में, असमानता बढ़ती जा रही है। जो खासी निराशाजनक स्थिति है।


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