भारत में किसी व्यक्ति की क्रेडिट प्रोफाइल को उसके बैंक खाते से भी अधिक आसानी से दुरुपयोग किया जा सकता है।

भारत की डिजिटल लेंडिंग व्यवस्था क्रेडिट ब्यूरो (जैसे ब्प्ठप्स्) पर निर्भर करती है, जो उधारकर्ताओं का पूरा भुगतान इतिहास रखती हैं। लोन आवेदन के समय बैंक तुरंत इन रिपोर्ट्स को एक्सेस करते हैं। लेकिन अपर्याप्त पहचान सत्यापन और ‘सत्यापित सहमति’ की कमी के कारण धोखेबाज केवल मोबाइल नंबर या ईमेल जैसे बुनियादी विवरणों का उपयोग करके क्रेडिट रिपोर्ट खिंचवा लेते हैं और लोन मंजूर करा लेते हैं।

कई बार धोखेबाज कमजोर सहमति सिस्टम, भ्रामक व्ज्च् प्रक्रियाओं और जल्दबाज़ी में किए जाने वाले डिजिटल लोन प्रोसेस का फायदा उठाकर किसी और के नाम पर लोन ले लेते हैं। कई पीड़ित अपनी रिपोर्ट से फर्जी लोन हटवाने में संघर्ष करते हैं और कभी-कभी क्रेडिट स्कोर खराब होने के डर से राशि भी चुका देते हैं। प्रभावशाली लोगों की शिकायतें जल्दी सुलझ जाती हैं, लेकिन सामान्य नागरिक अक्सर चुपचाप नुकसान झेलते हैं।

भारत की प्रणाली की कमजोरियों के तीन प्रमुख बिंदुः

  • क्रेडिट रिपोर्ट एक्सेस से पहले “सत्यापित, सूचित सहमति” का अभाव
  • रिपोर्ट खींचते समय कोई तुरंत SMS अलर्ट नहीं
  • उचित दस्तावेज़ और ID वेरिफिकेशन के बिना जल्दबाज़ी में फंड जारी करना

अन्य देशों में सुरक्षा अधिक मजबूत हैः जैसे एकीकृत क्रेडिट रिपोर्ट और क्रेडिट ‘‘लॉक‘‘ करने की सुविधा, ठीक वैसे ही जैसे भारत में डेबिट कार्ड ऑन/ऑफ किया जा सकता है।

हालांकि भारत के पास पहले से ही एक मजबूत Account Aggregator सहमति ढांचा मौजूद है, लेकिन इसे क्रेडिट ब्यूरो पर लागू नहीं किया गया है। यदि सत्यापित सहमति, त्वरित अलर्ट और सुरक्षित डिस्बर्सल जैसी प्रक्रियाएँ लागू हों, तो धोखाधड़ी के मामलों में भारी कमी आएगी।


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