न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देश की कृषि नीति का अनिवार्य अंग रहा है। इसके पीछे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा किसानों को कीमतों के जोखिम से बचाने जैसे नेक इरादे रहे हैं। लेकिन इसके कुछ अनचाहे परिणाम भी हैं जिनमें फसलों की विविधता कम होना और देश के कुछ हिस्सों में पर्यावरण को नुकसान शामिल हैं।

अब कृषि से होने वाली आय में इजाफे की जरूरत है मगर एमएसपी को कानूनी जामा पहनाना अच्छा नहीं रहेगा। इससे सही मूल्य निकालने में दिक्कत आ सकती है और आगे चलकर उत्पादन और भी बिगड़ सकता है।

राष्ट्रीय कृषि अर्थशास्त्र और नीति अनुसंधान संस्थान का हाल में आया एक अध्ययन कहता है कि 15 फीसदी किसान देश का 53.6 फीसदी गेहूं उगाते हैं मगर सरकारी खरीद (एमएसपी) में उनकी ज्यादा हिस्सेदारी नहीं है।

एमएसपी से होने वाली दूसरी दिक्कतें हैं खजाने से भारी रकम निकल जाना, बहुत पानी खर्च कराने वाली फसलों का जरूरत से ज्यादा उत्पादन और भंडारण की नाकाफी व्यवस्था।

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कृषि आय सुधारने के लिए जरूरी है कि बाजार अच्छी तरह काम करें। इसमें बुनियादी ढ़ाचे में निवेश और किफायती मूल्य श्रृंखला तैयार करना शामिल है।

कीमतों में उतार-चढ़ाव हमेशा किसानों के लिए जोखिम से भरा होता है और उन्हें इससे बचाने के लिए उस अध्ययन में भावांतर चुकाने की बात है। इसके तहत किसानों को बाजार में एमएसपी से जितनी कम कीमत मिलती है उस अंतर की भरपाई कर दी जाती है। इसका लक्ष्य एमएसपी नीति को खरीद से हटाकर आय का साधन बनाना है मगर इसका क्रियान्वयन भी दिक्कतों से भरा है। कई कृषि अर्थशास्त्री ने आशंका जताई है कि इस नीति से किसान तथा व्यापारी सांठगांठ कर बाजार मूल्य को एमएसपी से बहुत कम कर सकते हैं।

भारत को मुक्त बाजार और मजबूत कृषि मूल्य श्रृंखला चाहिए। विशेषज्ञों ने कहा भी है कि कृषि क्षेत्र में वृद्धि मोटे तौर पर एमएसपी के दायरे से बाहर वाले उत्पादों से हो रही है।

कृषि बाजारों को व्यापार के लिए खोलने के बढ़ते दबाव के बीच सरकार समेत सभी अंशधारकों को प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाने के रास्ते तलाशने होंगे।


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