भारत की वन विस्तार प्रणाली ने पारंपरिक वन क्षेत्रों के बाहर वृक्षारोपण को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे ग्रामीण आजीविका को समर्थन मिला है और प्राकृतिक वनों पर दबाव कम हुआ है। 1980 और 1990 के दशक में बाहरी सहायता प्राप्त सामाजिक वानिकी परियोजनाओं की सफलता के बाद, राज्य वन विभागों (एसएफडीएस) के भीतर समर्पित विस्तार ढांचे स्थापित किए गए, जिनका उद्देश्य किसानों और समुदायों को वृक्ष-आधारित खेती के लिए प्रेरित करना था।

हालांकि, इन परियोजनाओं के समाप्त होने और बाद में संस्थागत पुनर्गठन के कारण देशभर में वन विस्तार सेवाएं काफी कमजोर हो गई।

यह लेख तमिलनाडु और हरियाणा के सफल मॉडलों को प्रस्तुत करता है, जहां सक्रिय विस्तार प्रयासों और सार्वजनिक-निजी भागीदारी ने वृक्ष आधारित खेती की आर्थिक और पर्यावरणीय क्षमता को प्रदर्शित किया। साथ ही, इसमें भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की भूमिका का विश्लेषण किया गया है, जिन्होंने अनुसंधान, प्रशिक्षण और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच समन्वय को मजबूत किया।

भूमिका

1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग ने बढ़ती लकड़ी की मांग को पूरा करने और प्राकृतिक वनों पर दबाव कम करने के उद्देश्य से गैर-वन क्षेत्रों में सामाजिक वानिकी गतिविधियों को बड़े पैमाने पर अपनाने की सिफारिश की थी। 1988 की राष्ट्रीय वन नीति लागू होने के बाद, उद्योगों को अपनी कच्चे माल की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किसानों के साथ प्रत्यक्ष साझेदारी स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

1980 और 1990 के दशक में राज्य वन विभागों ने बाहरी सहायता प्राप्त परियोजनाओं के तहत वृक्षारोपण योजनाओं को लागू करने के लिए समर्पित सामाजिक वानिकी प्रकोष्ठ स्थापित किए। इन पहलों का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक वन क्षेत्रों के बाहर, विशेष रूप से पंचायत, सामुदायिक और कृषि भूमि पर लकड़ी उत्पादन को बढ़ावा देना था। इस प्रयास को समर्थन देने के लिए विस्तार प्रभाग स्थापित किए गए, जिनका कार्य पंचायतों और किसानों को वृक्षारोपण अपनाने के लिए प्रेरित करन था। नीचे कुछ उल्लेखनीय उदाहरण दिए गए है, जो भारत वृक्ष-आधारित खेती के सफल विस्तार को दर्शाते हैं।

तमिलनाडु

1998 में तमिलनाडु वन विभाग के अंतर्गत एक स्वतंत्र वन विस्ता प्रकोष्ठ स्थापित किया गया, जिसका नेतृत्व अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (एपीसीसीएफ) द्वारा किया गया तथा तीन मुख्य वन संरक्षकों (सीसीएफएस) का सहयोग प्राप्त था। इस प्रकोष्ठ का मुख्य उद्देश्य गैर-वन भूमि पर विभिन्न प्रकार की मिट्टी में वानिकी तकनीकों का विस्तार करना, जैव उर्वरक उत्पादन सिखाना, पर्यावरण शिक्षा देना और निजी कृ षि भूमि पर उन्नत वृक्ष प्रजातियों का प्रदर्शन करना था। इसका समग्र लक्ष्य प्राकृतिक बनों के बाहर वृक्ष आवरण बढ़ाना, किसानों, स्वयं सहायता समूहों और युवाओं को प्रशिक्षित करना, गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री उपलब्ध कराना तथा निजी भूमि पर वृक्षारोपण को बढ़ावा देना था।

इस प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए तमिलनाडु सरकार ने 36 वृक्ष प्रजातियों को टिम्बर ट्रांजिट नियमों से बाहर कर दिया, जिससे कटाई और परिवहन की प्रक्रिया आसान हो गई।

इसके परिणामस्वरूप निजी भूमि पर वृक्षारोपण कई प्रमुख योजनाओं जैसे जबिक, तमिलनाडु जैव विविधता संरक्षण परियोजना तथा अन्य हरित विकास कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। इन पहलों के तहत (यूकेलिप्टस को छोड़कर) वाणिज्यिक और बहुउद्देशीय वृक्ष प्रजातियों के रोपण को बढ़ावा दिया गया।

हरियाणा

1993 में क्लोन परीक्षण क्षेत्र के परिणामों के आधार पर यूकेलिप्टस के क्लोन 3. 7 और 10 को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए चुना गया। क्लोनल तकनीक का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करने के लिए आईटीसी भद्राचलम पेपरबोर्ड्स लिमिटेड का दौरा किया गया। इसके बाद सींथी, बिठमारा और सोहना में क्लोनल सीड ऑर्चर्ड स्थापित किए गए, जबकि सींथी में क्लोनल मल्टीप्लिकेशन क्षेत्र विकसित किया गया। आश्चर्यजनक रूप से, क्लोनल यूकेलिप्टस ने मात्र छह महीने के भीतर ही उत्कृष्ट परिणाम देना शुरू कर दिया।

अंबाला के सामाजिक वानिकी सर्कल ने कृषि भूमि पर क्लोनल यूकेलिप्टस को बढ़ावा देने में अग्रणी भूमिका निभाई। फील्ड स्टाफ ने किसानों से योगदान एकत्रित कर क्लोनल पौधों की खरीद सुनिश्चित की, और किसानों की प्रतिक्रिया अत्यंत सकारात्मक रही। (सपरा, 2023)

एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब अंबाला के कंवर पाल राणा ने क्लोनल पौधों की व्यवस्था की और एक प्रदर्शन प्लॉट स्थापित किया, जिसमें बीज से उगाए गए पौधों की तुलना में क्लोनल पौधों की बेहतर वृद्धि को प्रदर्शित किया गया। इसी दौरान, हरियाणा कम्युनिटी फॉरेस्ट्री प्रोजेक्ट के तहत सींथी में क्लोनल पौध तैयार करने के लिए मिस्ट चेंबर स्थापित किया गया।

2000 के दशक में, राज्य वन विभाग ने जलभराव वाले क्षेत्रों और राजमार्ग किनारों जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में क्लोनल यूकेलिप्टस के साथ वृक्षारोपण योजनाएं शुरू कीं, जिनका उद्देश्य प्रदूषण नियंत्रण भी था। विभाग द्वारा छोटे और सीमांत किसानों की कृषि भूमि पर निःशुल्क वृक्षारोपण भी किया गया। इन सभी प्रयासों ने मिलकर उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि की. वृक्ष कटाई चक्र को कम किया, किसानों की आय बढ़ाई और लकड़ी आधारित उद्योगों की बढ़ती कच्चे माल की मांग को पूरा करने में मदद की (सपरा, 2023)।

आईसीएफआरई की पहले

कृषि फसलों के विपरीत, वृक्ष आधारित खेती से आर्थिक लाभसामान्यतः लंबे समय बाद प्राप्त होते हैं। इसके अलावा, नियंत्रित बाजार, सुनिश्चित मूल्य व्यवस्था और पारदर्शी परिवहन नियमों की कमी के कारण किसानों को वृक्षारोपण के लिए प्रेरित करना चुनौतीपूर्ण होता है। परिणामस्वरूप, उन्नत क्लोन और उच्च उत्पादकता वाली प्रजातियों की क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए, भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) ने अपने प्रमुख हितधारकों, राज्य बन विभागों (एसएफडीएस) के साथ समझौता ज्ञापन (MoUs) पर हस्ताक्षर किए हैं, ताकि संसाधनों और विशेषज्ञता का बेहतर उपयोग किया जा सके। इन साझेदारियों के माध्यम से लगातार अपने अनुसंधान परिणामों को किसानों तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है। इसके अतिरिक्त, आईसीएफआरई ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICFRE) के साथ भी समझौता किया है और कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीकेएस) के सहयोग से एग्रोफरिस्ट्री को बढ़ावा दे रहा है (आईसीएफआरई, 2023)।

ICFRE ने अपने नौ अनुसंधान संस्थानों के माध्यम से 34 वन विज्ञान केंद्र (वीवीकेएस) स्थापित किए हैं, जो एसएफडीएस और केवीकेएस के सहयोग से किसानों तक तकनीकी जानकारी पहुंचाते हैं। ये केंद्र प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने, प्रदर्शन प्लॉट बनाए रखने और फील्ड विजिट्स आयोजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, ‘लैब टू लैंड‘ कार्यक्रम के तहत आईसीएफआरई ने मॉडल गांव विकसित किए हैं. जहां वानिकी तकनीकों के व्यावहारिक उपयोग का प्रदर्शन किया जाता है।

हालांकि, वृक्ष फसलों की लंबी परिपक्वता अवधि, सुनिश्चित खरीद (बाय-बैंक) व्यवस्था की कमी और सीमित विस्तार गतिविधियों जैसी चुनौतियों ने इन पहलों की सफलता को सीमित किया है। हाल ही में वीवीकेएस के मूल्यांकन में कई संचालन संबंधी कमियां सामने आई है. जिससे वर्तमान विस्तार रणनीतियों की समीक्षा और सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता स्पष्ट होती है (आईसीएफआरई. 2023)।

चुनौतियाँ

बाहरी सहायता प्राप्त सामाजिक वानिकी परियोजनाओं के समाप्त होने के बाद, राज्य वन विभागों के भीतर समर्पित विस्तार ढांचा समाप्त कर दिया गया। परिणामस्वरूप वृक्ष फसलों के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी नियमित वन कर्मचारियों पर आ गई, जो पहले से ही अपने मुख्य कार्यों में व्यस्त थे। इस कारण एग्रोफॉरेस्ट्री विस्तार सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं।

आज भी अनेक किसान एग्रोफॉरेस्ट्री से जुड़ी आय संभावनाओं और उन्नत कृषि पद्धतियों से अनभिज्ञ है। अध्ययन बताते हैं कि पारंपरिक फसल प्रणाली से एग्रोफरिस्ट्री की ओर बदलाव करने से किसानों की वार्षिक आय लगभग 1.5 गुना तक बढ़ सकती है। इसके अलाया, कार्बन क्रेडिट भी अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकते हैं।

फिर भी, सीमित विस्तार सेवाओं और जानकारी के अभाव के कारण किसान वृक्षारोपण के लाभों को समझ नहीं पाते और इसे अपनाने में हिचकिचाते हैं। विशेष रूप से यूकेलिप्टस जैसी प्रजातियों के बारे में मिट्टी की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव की गलत धारणाएं भी किसानों की अनिच्छा का कारण बनती हैं (PAD 2023)।

सुझाए गए सुधारात्मक उपाय

एग्रोफॉरेस्ट्री प्रणालियों के प्रभावी प्रबंधन, जोखिमों को कम करने और सफलता को अधिकतम करने के लिए किसानों को आवश्यक मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और सहयोग प्रदान करने हेतु विस्तार सेवाओं का सुदृढ़ होना अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य से वन विस्तार प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए निम्नलिखित सुधारात्मक उपाय प्रस्तावित किए गए हैं:

  1. वैज्ञानिकों की फील्ड में सक्रिय भागीदारी

माननीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री द्वारा विकसित कृषि संकल्प अभियान की शुरुआत की गई है. जिसके अंतर्गत कृषि वैज्ञानिकों को किसानों की आय बढ़ाने में सहयोग के लिए प्रत्येक वर्ष एक माह तक खेतों में कार्य करना आवश्यक है। इसी प्रकार, वानिकी वैज्ञानिकों को भी प्रति वर्ष एक से तीन माह तक सीधे किसानों के साथ जुड़कर वृक्ष आधारित खेती के माध्यम से आय बढ़ाने के प्रयासों में भाग लेना चाहिए।

  1. तकनीक के प्रसार में जवाबदेही

नई तकनीकों का विकास करने वाले शोधकर्ताओं को उनकी जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन और किसानों द्वारा अपनाने की जिम्मेदारी भी दी जानी चाहिए। इससे उन्हें व्यावहारिक फीडबैक प्राप्त होगा, तकनीक में सुधार संभव होगा और जवाबदेही बढ़ने से सफलता की दर में भी वृद्धि होगी।

  1. राज्य वन विभाग (SFDs) और राज्य कृषि विभाग (SADs) के बीच समन्वय

प्रभावी प्रशासन के लिए एसएफडीएस और राज्य कृषि विभागों के बीच स्पष्ट भूमिका निर्धारण और अधिकार क्षेत्र का विभाजन आवश्यक है। कृषि विभाग द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी योजनाएं किसानों को एग्रोफॉरेस्ट्री अपनाने में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान कर सकती है। राज्य कृषि विभाग के विस्तार अधिकारी किसानों को वृक्षारोपण, प्रबंधन और रखरखाव के साथ-साथ स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त वृक्ष प्रजातियों के चयन में मार्गदर्शन दे सकते हैं। (PAD, 2023)

  1. ICAR और ICFRE के बीच सहयोग

इस उद्देश्य के लिए वैज्ञानिकों के सहयोग से एक समर्पित विस्तार सेवा टीम का गठन आवश्यक है। वैज्ञानिकों और विस्तार अधिकारियों का संयुक्त प्रयास इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रतिष्ठित संस्थानों के वैज्ञानिक अनुसंधान, फसल चयन और एग्रोफॉरेस्ट्री की सर्वाेत्तम प्रथाओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। वे विस्तार अधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदान करने में भी सहायक होंगे। इन प्रयासों को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। देशभर में कृषि विज्ञान केंद्र (केवीकेएस) और वन विज्ञान केंद्र (वीवीकेएस) किसानों तक जानकारी पहुंचाने और प्रशिक्षण देने के प्रमुख केंद्र बन सकते हैं। (PAD, 2023)

  1. प्रदर्शन प्लॉट की स्थापना

राज्यभर में प्रदर्शन फार्म और एग्रोफॉरेस्ट्री अनुसंधान केंद्र स्थापित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये प्रदर्शन फार्म किसानों के लिए व्यावहारिक शिक्षण केंद्र के रूप में कार्य कर सकते हैं, जहां वे एग्रोफॉरेस्ट्री के लाभ और सर्वाेत्तम प्रथाओं को प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं। किसान विशेषज्ञों से सीख सकते हैं। (PAD 2023)

  1. किसान हेल्पलाइन की स्थापना

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ज्ञान भंडार के रूप में कार्य कर सकते हैं, जहां किसानों को नवीनतम अनुसंधान, एग्रोफॉरस्ट्री से संबंधित दिशा-निर्देश और विशेषज्ञ सलाह उपलब्ध हो सके। इसके अतिरिक्त, किसान हेल्पलाइन एक प्रत्यक्ष सहायता माध्यम के रूप में कार्य कर सकती है, जिससे किसान अपनी समस्याओं का तुरंत समाधान प्राप्त कर सकें और एग्रोफॉरेस्ट्री से जुड़े प्रश्नों के उत्तर पा सकें। (PAD, 2023)

  1. बड़े लकड़ी-आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन

विमको सीडलिंग्स लिमिटेड (जो अब उत्तराखंड में स्थित है) ने वर्ष 1984 में उच्च गुणवत्ता वाले पौध सामग्री की आपूर्ति, ऋण सुविधाओं से जोड़ने, वैज्ञानिक प्रबंधन पद्धतियों का विकास करने और सुनिश्चित खरीद (बाय-बैंक) समझौतों की पेशकश के माध्यम से पॉपलर खेती को बढ़ावा देने में अग्रणी भूमिका निभाई।

इसी प्रकार, आईटीसी भद्राचलम प्राइवेट लिमिटेड ने 1989 से दक्षिण भारत में क्लोनल यूकेलिप्टस, कैसुअरीना और सुबाबुल की खेती को बढ़ावा देकर महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

इन पहलों ने न केवल संबंधित कंपनियों की कच्चे माल की आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद की, बल्कि पूरे देश में क्लोनल यूकेलिप्टस के व्यापक प्रसार को भी गति दी। इस प्रवृत्ति को और मजबूत करने के लिए. उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (च्स्प्) योजना के लाभों का विस्तार करते हुए बड़े लकड़ी-आधारित औद्योगिक इकाइयों की स्थापना और विस्तार को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। (सपरा, 2025)

  1. चरणबद्ध विस्तार रणनीति

वृक्ष आधारित खेती के विस्तार तंत्र को प्रतिवर्ष 100 जिलों में सुदृढ किया जा सकता है। प्रारंभिक चरण में उन जिलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जहां लकड़ी-आधारित उद्योगों की उपस्थिति के कारण एग्रोफॉरेस्ट्री पहले से विकसित हो चुकी है। इसके बाद, आस-पास के जिलों को शामिल करते हुए क्लस्टर आधारित - दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है, जिससे विस्तार प्रणाली को और अधिक मजबूत किया जा सके।

निष्कर्षः

इस प्रकार, वृक्ष आधारित खेती को राज्य वन विभागों और राज्य कृषि विभागों के माध्यम से सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिसमें भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की पूरक भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

वृक्ष आधारित खेती पारंपरिक कृषि फसलों की तुलना में किसानों को अधिक लाभ प्रदान करती है।

एग्रोफॉरेस्ट्री ग्रामीण परिदृश्य में परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकती है, जो वर्षा जल संचयन, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने, मौसम संबंधी जोखिमों को घटाने तथा आर्थिक रूप से कमजोर और कम शिक्षित वर्गों के लिए रोजगार सृजन जैसे अनेक लाभ प्रदान करती है।

एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल का प्रभावी क्रियान्वयन देश के 33 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र को वन और वृक्ष आवरण के अंतर्गत लाने के राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

अतः यह अत्यंत आवश्यक है कि विस्तार सेवाओं को सुदृढ़ किया जाए, जिसके लिए सुदृढ़ नीतिगत पहल और पर्याप्त वित्तीय समर्थन उपलब्ध कराया जाए, ताकि पर्याप्त मानव संसाधन और तकनीकी सहायता सुनिश्चित हो सके और किसानों को इसका अधिकतम लाभ मिल सके।