भारत इस वर्ष के अंत तक भारतीय कार्बन बाज़ार (ICM) का पहला ट्रेडिंग सत्र आयोजित करने की योजना बना रहा है। यह 2023 से चल रही प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव है। ICM की शुरुआत विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र की कार्बन उत्सर्जन तीव्रता को कम करने के लिए एक प्रभावशाली नीतिगत साधन साबित हो सकती है।

बाज़ार-आधारित नियमन पर्यावरणीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के साथ-साथ आर्थिक विकास को भी बढ़ावा देने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है। गुजरात सरकार द्वारा स्थानीय वायु प्रदूषण के लिए विकसित नए बाज़ार ने मौजूदा नीतियों की तुलना में कहीं कम आर्थिक लागत पर प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी की। यही बाज़ार सिद्धांत ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) के उत्सर्जन को नियंत्रित करने में भी प्रभावी हो सकते हैं। हालांकि इसकी संभावनाएँ बहुत अधिक हैं, लेकिन भारत में पर्यावरणीय बाज़ारों का अनुभव हमेशा समान रूप से सफल नहीं रहा है।

परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड (PAT) योजना, जो ICM की पूर्ववर्ती योजना थी, में ऊर्जा बचत के लिए आवश्यकता से कहीं अधिक परमिट जारी कर दिए गए थे। परिणामस्वरूप उद्योगों के पास ऊर्जा संरक्षण के लिए कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं बचा।

इसी प्रकार नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र (RECs) की ट्रेडिंग व्यवस्था भी सक्रिय नहीं हो सकी। प्रमाणपत्रों की आपूर्ति मांग से कहीं अधिक रही। यद्यपि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा तेज़ी से आगे बढ़ रही है, लेकिन इसका मुख्य कारण अन्य सरकारी नीतियाँ और निजी निवेश रहे हैं।

ICM अपने पूर्ववर्तियों से बेहतर कैसे साबित हो सकता है?

उत्सर्जन तीव्रता में कमी लाना एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। अल्पकालिक परिणामों की अपेक्षा बाज़ार की विश्वसनीयता अधिक महत्वपूर्ण है। सभी प्रतिभागियों को यह विश्वास होना चाहिए कि यह बाज़ार स्थायी है और उनके व्यवसाय के लिए लाभ का अवसर प्रदान करेगा।

यह विश्वास तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित होना चाहिए:

  1. पारदर्शिता

पारदर्शिता का अर्थ है कि परमिट की कीमत तय करने के लिए खुली नीलामी (Open Auctions) आयोजित की जाए। केवल कीमतों की जानकारी होने पर ही उद्योग यह निर्णय ले सकते हैं कि उत्सर्जन कम करने के लिए निवेश करना कितना लाभदायक होगा।

ICM के पहले वर्ष में अनुपालन (Compliance) के लिए उत्सर्जन का आकलन वित्त वर्ष 2025-26 के आधार पर किया गया, जबकि ट्रेडिंग 2026 के अंत में होगी। तब तक उत्सर्जन पहले ही तय हो चुका होगा।

उद्योगों को शुरुआत से ही परमिट खरीदने और बेचने की अनुमति मिलनी चाहिए। प्रत्येक अनुपालन अवधि से पहले सरकार को परमिट की नीलामी आयोजित कर बाज़ार को सक्रिय करना चाहिए। भारत में पहले से ही सफल कमोडिटी और बिजली एक्सचेंज मौजूद हैं। गुजरात के अनुभव में प्रारंभिक नीलामी ने उत्सर्जन बाज़ार में व्यापक भागीदारी सुनिश्चित की थी। बाज़ार में सक्रिय ट्रेडिंग से ही उद्योगों को यह स्पष्ट संकेत मिलेगा कि प्रत्येक वर्ष उत्सर्जन कम करने का आर्थिक मूल्य कितना है।

  1. स्थिरता

स्थिरता का अर्थ है कि बाज़ार में कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए न्यूनतम और अधिकतम मूल्य निर्धारित किए जाएँ।

दुनिया भर में कार्बन बाज़ार प्रभावी सिद्ध हुए हैं, लेकिन कार्बन की कीमतों में भारी अस्थिरता भी देखी गई है। ऐसी अस्थिरता उद्योगों और सरकार दोनों के बाज़ार के प्रति विश्वास को कमजोर कर सकती है। सरकार को कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए एक मूल्य सीमा निर्धारित करनी चाहिए। शुरुआत के लिए ₹600 से ₹3,000 प्रति टन Co₂-समतुल्य (tCo₂e) की सीमा उपयुक्त हो सकती है। यह सीमा भारत के लिए कार्बन की सामाजिक लागत (Social Cost of Carbon) के लगभग बराबर है।

कार्बन की सामाजिक लागत से आशय उस अतिरिक्त एक टन Co₂ उत्सर्जन से होने वाली कुल क्षति से है, जिसमें आर्थिक उत्पादन में कमी, मृत्यु दर में वृद्धि तथा जलवायु परिवर्तन से होने वाले अन्य नुकसान शामिल हैं। प्रस्तावित अधिकतम मूल्य इस आधार पर भी उचित है कि यह बिजली ग्रिड में सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाकर कार्बन उत्सर्जन कम करने की अनुमानित लागत के लगभग बराबर है।

  1. विश्वसनीयता

सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी उद्योग अपनी प्रति इकाई उत्पादन के अनुरूप उत्सर्जन को कवर करने के लिए पर्याप्त परमिट रखें। यही पूरे कार्बन बाज़ार की नींव है। विश्वसनीयता का अर्थ यह भी है कि संबंधित मंत्रालय मूल्य सीमा को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यकतानुसार परमिट खरीदने और बेचने की जिम्मेदारी निभाएँ।

यदि मूल्य सीमा केवल कागज़ों तक सीमित रह गई, तो उद्योग उत्सर्जन कम करने में निवेश नहीं करेंगे। प्रभावी न्यूनतम मूल्य का अर्थ है कि सरकार उस निर्धारित कीमत पर उद्योगों द्वारा बेचे जाने वाले सभी परमिट खरीदने और उन्हें बाज़ार से स्थायी रूप से हटाने के लिए तैयार रहे। ऐसी एकमुश्त लागत बाज़ार की विश्वसनीयता बढ़ाने की तुलना में बहुत कम होगी और भविष्य में परमिट की बिक्री से इसकी भरपाई आसानी से की जा सकती है।

स्वच्छ विकास की दिशा में भारत का प्रतीक

भारतीय कार्बन बाज़ार (ICM) केवल एक तकनीकी नीति नहीं है। यह इस बात का प्रतीक है कि भारत, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए ऐतिहासिक रूप से प्रमुख जिम्मेदार न होने के बावजूद, स्वच्छ और सतत विकास (Clean Growth) के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध है।

विश्व स्तर पर इस पहल की प्रतिष्ठा इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत ऐसा कार्बन बाज़ार स्थापित कर सके जो वास्तव में प्रभावी, पारदर्शी और विश्वसनीय हो।

Courtesy : Rohini Panday & Nicholas Ryan