नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा की अध्यक्षता में गठित उच्चस्तरीय पैनल ने तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) की सीमा को 500 मीटर से घटाकर 200 मीटर करने की सिफारिश की है, जिससे भारत के मानक वैश्विक प्रथाओं (जहां सीमा सामान्यतः 100 मीटर से कम है) के अनुरूप हो जाएंगे।

यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर घोषित सुधार एजेंडा को आगे बढ़ाते हुए पर्यावरणीय विनियमों में व्यापक बदलाव के लिए 12 सूत्री कार्ययोजना प्रस्तुत करती है।

प्रमुख सिफारिशें

    1. सीआरज़ेड सीमा में कमी (समयसीमाः 31 जनवरी 2026)
    • वर्तमान 500 मीटर सीमा को “अत्यधिक प्रतिबंधात्मक” बताया गया है, जिससे पर्यटन, मत्स्य पालन और तटीय बुनियादी ढांचा प्रभावित होता है।
    • इसे 200 मीटर तक घटाने से लगभग 2,790 वर्ग किमी तटीय भूमि आर्थिक गतिविधियों के लिए मुक्त होगी, जबकि पर्यावरणीय सुरक्षा बनी रहेगी।
    1. ग्रीन कंसेंट प्रक्रिया सरल बनाना (समयसीमाः 30 नवंबर)
    • प्रदूषण नियंत्रण स्वीकृति के लिए स्व-प्रमाणन और तृतीय-पक्ष ऑडिट प्रणाली लागू की जाएगी।
    • उद्योगों को एकमुश्त संचालन स्वीकृति मिलेगी, दोबारा नवीनीकरण की आवश्यकता नहीं होगी।
    • निरीक्षण अब स्वतंत्र ऑडिटर्स द्वारा होंगे, न कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों द्वारा।
    • उद्योगों के लिए निर्धारित न्यूनतम दूरी (साइटिंग नॉर्म) को समाप्त करने का प्रस्ताव।

 

    1. ग्रीन कवर आवश्यकता में कमी (समयसीमाः 31 अक्टूबर)
    • वर्तमान 33-40 प्रतिशत हरित क्षेत्र की अनिवार्यता घटाकर 10-15 प्रतिशत करने का सुझाव।
    • इससे भूमि अधिग्रहण की लागत कम होगी और यह वियतनाम, इंडोनेशिया और ब्राज़ील जैसे देशों के मानकों के अनुरूप होगा।
    1. पर्यावरणीय स्वीकृति प्रक्रिया में ढील
    • ऐसे परियोजनाओं को स्वतः स्वीकृति, जिनसे प्रदूषण में वृद्धि नहीं होगी।
    • औद्योगिक एस्टेट के भीतर स्थित इकाइयों को अलग से मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी।
    • कैटेगरी-बी परियोजनाओं की स्वीकृति में देरी रोकने के लिए राज्य स्तरीय समिति को अधिकार दिया जाएगा।
    1. वन भूमि स्वीकृति सुधार
    • उद्योगों के लिए क्षतिपूरक वनीकरण हेतु अविकसित (degraded) भूमि का उपयोग किया जाएगा।
    • राज्य सरकारें उपलब्ध गैर-वन भूमि का डिजिटल मानचित्रण कर उद्योगों के साथ साझा करेंगी।

इन सुधारों का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन बनाना, अनुमोदन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लाना और भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना है। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा इन सिफारिशों को 15 अक्टूबर से 30 नवंबर 2025 के बीच अधिसूचनाओं और दिशा-निर्देशों के माध्यम से लागू किया जाएगा।


 

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