मांग को बढ़ावा देने के लिए सितंबर 2025 में जी एस टी दरों में कटौती और वर्तमान में जारी ईरान संकट के बाद भी जीएसटी संग्रह अप्रैल, 2026 में बढ़कर करीब 2.43 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।

पहली नजर में यह आंकड़ा अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत देता है। आमतौर पर अप्रैल में जी एस टी संग्रह में तेजी आती है, क्योंकि कंपनियों का मार्च के वर्षांत में बिक्री लक्ष्य पूरा करने और अपने वित्त वर्ष के खाते बंद करने पर जोर रहता है।।

लेकिन, आंकड़ों के पीछे असली कहानी कुछ और है। इस बार रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह की असली ताकत घरेलू खपत नहीं, बल्कि महंगे आयात से प्राप्त राजस्व है।

1 मई को जारी सरकारी आकड़ों के मुताबिक, अप्रैल में महंगे दाम पर आयातित वस्तुओं पर प्राप्त जीएसटी राजस्व 25.8 फीसदी बढ़कर 57,580 करोड़ पहुंच गया। इसके मुकाबले घरेलू लेनदेन से राजस्व सिर्फ 4.3 फीसदी बढ़कर 1.85 लाख करोड़ रुपये रहा। यानी रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह के पीछे घरेलू, बाजार की मांग से ज्यादा भूमिका, महंगे आयात की रही।

कुल घरेलू राजस्व 1.85 लाख करोड़ रुपये होने के बावजूद, शुद्ध घरेलू प्राप्तियां महज 0.3 फीसदी बढ़कर 1.65 लाख करोड़ रुपये रही। इसकी वजह ज्यादा रिफंड रहा, जिससे बढ़त बेअसर हो गई। इसके विपरीत आयात से होने वाला शुद्ध जीएसटी राजस्व 42.9 फीसदी बढ़कर 45,784 करोड़ रुपये रहा।

दरअसल, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल, उर्वरक और कई कमोडिटी की कीमतें ऊपर हैं। युद्ध और आपूर्ति श्रृंखला में अड़चनों ने आयात लागत बढ़ा दी है। जब आयात महंगा होता है, तो उस पर लगने वाला कर संग्रह भी बढ़ता है। यही वजह है कि आयात जीएसटी में तेज उछाल दिखा।

यहीं से चिंता शुरू होती है। अगर जीएसटी संग्रह बढ़ा है, लेकिन घरेलू लेनदेन की रफ्तार कमजोर है, तो इसका मतलब है कि खपत उतनी मजबूत नहीं है, जितनी जीएसटी का आंकड़ा दिखा रहा है।

आम उपभोक्ता गैर-जरूरी खर्चों में सावधानी बरत रहा है। महंगाई और अनिश्चितता के बीच घरेलू मांग पूरी ताकतं में से नहीं लौट पा रही।

यह आंकड़ा घरेलू विनिर्माण एवं मेक इन इंडिया को और मजबूत करने की जरूरत भी बताता है।


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