Forward booking of rupee should be backed by genuine Transactions
- अप्रैल 8, 2026
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रुपये को स्थिर रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा हाल ही में फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स के कैंसलेशन और रीबुकिंग पर लगाई गई पाबंदियों ने वास्तविक व्यापारिक गतिविधियों पर इसके प्रभाव को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
इस मुद्दे के केंद्र में RBI का वह कदम है, जिसके तहत कॉरपोरेट्स द्वारा फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स के दुरुपयोग को रोकने की कोशिश की गई है। पहले कई कंपनियां रुपये के कमजोर होने पर पुराने कॉन्ट्रैक्ट्स को रद्द कर अधिक अनुकूल दरों पर नए कॉन्ट्रैक्ट बुक कर रही थीं, जिससे हेजिंग टूल्स सट्टेबाजी के साधन बन गए थे। इसी को रोकने के लिए RBI ने इस पर प्रतिबंध लगाया।
हालांकि, असली चुनौती सट्टेबाजी और वास्तविक जोखिम प्रबंधन के बीच अंतर करने की है। आज के अनिश्चित वैश्विक माहौलकृजिसमें भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई चेन में बाधाएं और भुगतान में देरी शामिल हैंकृमें कंपनियों को अपने विदेशी मुद्रा जोखिम को संभालने के लिए लचीलापन चाहिए।
उदाहरण के तौर पर, निर्यातकों को भुगतान में देरी होने पर अपने फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स को आगे बढ़ाना (रोलओवर करना) पड़ सकता है। लेकिन तकनीकी रूप से रोलओवर में पुराने कॉन्ट्रैक्ट को रद्द कर नया बुक करना शामिल होता है, जो अब त्ठप् के प्रतिबंध के दायरे में आ सकता है। इससे कॉरपोरेट्स में भ्रम और चिंता बढ़ गई है।
बैंक भी इस विषय में स्पष्टता चाहते हैं, खासकर एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स (ECB) की हेजिंग को लेकर। चूंकि ये लंबी अवधि के ऋण होते हैं, इसलिए इनमें समय-समय पर फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स का नवीनीकरण आवश्यक होता है। स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में यह अनिश्चितता बनी हुई है कि ऐसे रोलओवर को नए नियमों के तहत कैसे देखा जाएगा।
एक और चिंता “ओवरबुकिंग” की है, जहां कंपनियां अपने वास्तविक जोखिम से अधिक फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स बुक करती हैं ताकि मुद्रा के उतार-चढ़ाव से लाभ उठा सकें। इसे नियंत्रित करने के लिए बैंक अब कंपनियों से अतिरिक्त दस्तावेज या घोषणा पत्र मांग सकते हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी फॉरवर्ड बुकिंग वास्तविक लेन-देन पर आधारित हों। हालांकि इससे पारदर्शिता बढ़ सकती है, लेकिन इससे अनुपालन (compliance) का बोझ भी बढ़ेगा।
इस बीच, RBI द्वारा ऑफशोर नॉन-डिलीवेरेबल फॉरवर्ड (NDF) बाजार तक पहुंच सीमित करने के प्रयासों के भी मिश्रित परिणाम सामने आए हैं। जहां इससे घरेलू स्तर पर सट्टेबाजी कम हुई है, वहीं वैश्विक संचालन वाली बड़ी कंपनियां अभी भी ऑफशोर और ऑनशोर बाजारों के बीच मूल्य अंतर का लाभ उठा रही हैं। यह दर्शाता है कि वैश्विक वित्तीय प्रणाली में मुद्रा बाजार को नियंत्रित करना कितना चुनौतीपूर्ण है।
RBI ने पारदर्शिता बढ़ाने के लिए मल्टीनेशनल बैंकों से ऑफशोर ट्रेडिंग डेटा साझा करने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन विदेशी बैंकों ने इसका विरोध किया है, जिससे नियामक ढांचे की जटिलता और बढ़ गई है।
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