भारत तेल आयात को कम करने और नेट-ज़ीरो लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कोयला आधारित गैस उत्पादन (Coal Gasification) को तेजी से बढ़ा रहा है। देश ने 2030 तक 100 मिलियन टन (MT) कोल गैसीफिकेशन क्षमता का लक्ष्य रखा है। प्रमुख परियोजनाओं में उर्वरक और इस्पात उत्पादन के लिए, सरफेश कोल गैसिफिकेसन और कोल बेड मीथेन CBM शामिल है, जिसके लिए सरकार द्वारा कुल 4 लाख करोड़ रूपये का निवेश और ₹8,500 करोड़ के प्रोत्साहन (इंसेंटिव) दिए जा रहे हैं।

प्रमुख प्रोजेक्ट और कंपनियां

तालचर फर्टिलाइजर प्लांट: Coal India (CIL), RCF, GAIL और FCIL का संयुक्त उपक्रम, जिसमें कोयला गैसीफिकेशन तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

जिंदल स्टील एंड पावर (JSPL): ओडिशा के अंगुल में स्थित प्लांट में कोयला आधारित सिंगैस (Syngas) का उपयोग DRI (Direct Reduced Iron) उत्पादन के लिए किया जा रहा है।

CIL सहयोग परियोजनाएं: CIL, BHEL और GAIL के साथ मिलकर Coal-to-Synthetic Natural Gas (SNG) और अमोनियम नाइट्रेट प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है (पश्चिम बंगाल और ओडिशा में), जिनके 2029-30 तक चालू होने की उम्मीद है।

न्यू एरा क्लीन टेक: महाराष्ट्र में 5 MTPA क्षमता का प्रोजेक्ट स्थापित कर रही है।

सरकारी प्रोत्साहन (Incentives): गैसीफिकेशन में उपयोग होने वाले कोयले पर PSU और निजी कंपनियों के लिए 50% राजस्व हिस्सेदारी में छूट ₹8,500 करोड़ की Viability Gap Funding (VGF) योजना

कोल बेड मीथेन (CBM): एक असामान्य प्राकृतिक गैस है जो कोयले की परतों से निकाली जाती है मार्च 2025 तक लगभग 2.27 MMSCMD उत्पादन वर्तमान में 6 ब्लॉक्स में उत्पादन जारी और Reliance Industries (RIL), मध्य प्रदेश के शाहडोल में प्रमुख संचालन कर्ता।

वर्तमान में भारत का कोल गैसीफिकेशन उत्पादन चीन के मुकाबले केवल 3-5% है (चीन का उत्पादन लगभग 80 MMTPA है)। हालांकि दोनों देशों ने लगभग एक ही समय पर इस तकनीक की शुरुआत की थी, लेकिन चीन ने बड़े पैमाने पर सफलता हासिल की है-वह अपने 90% अमोनिया और 70% मेथनॉल उत्पादन के लिए

इस अंतर के मुख्य कारण

  1. निम्न गुणवत्ता वाला कोयला (उच्च राख सामग्री)

राख की समस्या: भारतीय थर्मल कोयले में आमतौर पर 35-50% राख होती है, जबकि वैश्विक औसत 10-15% है और चीन में इससे भी कम है। कोयले का उपयोग करता है, जबकि भारत अभी भी आयात पर काफी निर्भर है।

तकनीकी चुनौतियां: अधिक राख के कारण “क्लिंकरिंग” (चिपचिपा अवशेष) बनता है, जो गैसीफायर को जाम कर देता है। अधिकांश अंतरराष्ट्रीय तकनीकें 25% से कम राख वाले कोयले के लिए डिजाइन की गई हैं।

कोयला धुलाई (Beneficiation) की कमी: चीन अपने 70-75% कोयले को धोता (Wash) है, जबकि भारत में यह लगभग नहीं के बराबर है।

  1. रणनीतिक निरंतरता बनाम बाजार पर निर्भरता

चीन का दृष्टिकोण: चीन ने कोल गैसीफिकेशन को ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक रणनीतिक हथियार माना और बाजार उतार-चढ़ाव के बावजूद लगातार निवेश किया।

भारत की स्थिति: भारत में इस क्षेत्र में रुचि अक्सर कच्चे तेल की कीमत कम होने पर घट जाती है, जिससे महंगे प्रोजेक्ट कम आकर्षक लगते हैं।

  1. निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर का स्तर

उच्च पूंजी निवेश: चीन ने दशकों तक भारी निवेश और कौशल विकास किया।

खनन गहराई: चीन में गहरे भूमिगत खनन (3 किमी तक) होता है, जबकि भारत मुख्यतः ओपनकास्ट खनन पर निर्भर है, जिससे बड़े भंडार अभी भी उपयोग में नहीं आ पाए हैं।

तकनीकी अंतर: चीन ने पश्चिमी तकनीक अपनाकर अपनी तकनीक विकसित कर ली है, जबकि भारत अभी भी उच्च राख वाले कोयले के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित करने के चरण में है।

  1. नीति और क्रियान्वयन की चुनौतियां

औद्योगिक सहयोग की कमी: शुरुआती अनुसंधान (R-D) में उद्योगों के साथ मजबूत जुड़ाव और निरंतर फंडिंग की कमी रही।

व्यावसायिक अनिश्चितता: उच्च पूंजी लागत (CAPEX) और बड़े पैमाने पर सफल मॉडल की कमी के कारण निजी निवेश सीमित रहा है।


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