Units without Prior Environmental clearance, get relief from Apex court
- मई 8, 2026
- 0
प्लाईवुड, लैमिनेट और पैनल उद्योगों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के उन आदेशों को निरस्त कर दिया है, जिनमें राजस्थान और हरियाणा की कई फॉर्मल्डिहाइड और रेजिन निर्माण इकाइयों को पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance - EC) के बिना संचालन करने के कारण बंद करने का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने कहा कि संबंधित उद्योगों ने जानबूझकर पर्यावरणीय कानूनों का उल्लंघन नहीं किया और न ही उनकी कोई दुर्भावनापूर्ण मंशा थी।
अदालत ने कहा: “यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें उद्योगों ने कानूनी आवश्यकताओं की अनदेखी करते हुए जानबूझकर इकाइयाँ स्थापित कर संचालन शुरू किया हो। बल्कि स्वयं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी इस बात को लेकर असमंजस में थे कि EIA Notification, 2006 के तहत पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी आवश्यक है या नहीं।”
पीठ ने यह भी कहा कि संबंधित इकाइयों ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से नोटिस मिलने के बाद पर्यावरणीय मंजूरी के लिए आवेदन कर दिया था और वे आवेदन अभी लंबित हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में दायर कई मूल याचिकाओं से उत्पन्न हुआ, जिनमें आरोप लगाया गया था कि फॉर्मल्डिहाइड निर्माण इकाइयाँ Environment Impact Assessment ¼EIA½ Notification, 2006 के तहत आवश्यक पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त किए बिना संचालन कर रही हैं।
NGT ने 03.06.2021 के आदेशों में कहा था कि ऐसी इकाइयाँ पूर्व EC के बिना संचालित नहीं हो सकतीं और उन्हें बंद करने का निर्देश दिया था। ट्रिब्यूनल ने अपने पूर्व निर्णय Dastak NGO v- Synochem Organics Pvt- Ltd- पर भरोसा किया था।
इसके बाद प्रभावित इकाइयों ने सुप्रीम कोर्ट में इन बंदी आदेशों को चुनौती दी।
पाहवा प्लास्टिक्स फैसले का सहारा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व महत्वपूर्ण फैसले Pahwa Plastics Pvt- Ltd- v- Dastak NGO (2023) का व्यापक रूप से उल्लेख किया, जिसमें इसी प्रकार के NGT बंदी आदेशों को निरस्त किया गया था।
पाहवा प्लास्टिक्स मामले में अदालत ने कहा था कि:
- जिन उद्योगों के पास वैध Consent to Establish (CTE) और Consent to Operate (CTO) मौजूद हैं, उन्हें केवल इस आधार पर बंद नहीं किया जा सकता कि उन्होंने पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त नहीं की थी, विशेषकर तब जब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड स्वयं EC की आवश्यकता को लेकर स्पष्ट नहीं थे।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी थे असमंजस में
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि: राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 19.08.2019 को, जबकि हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 10.11.2020 को ऑफिस आदेश जारी कर, पहले से संचालित फॉर्मल्डिहाइड इकाइयों को निर्धारित समय सीमा में पर्यावरणीय मंजूरी के लिए आवेदन करने का निर्देश दिया था।
अदालत ने रिकॉर्ड किया कि सभी अपीलकर्ता इकाइयों ने इन निर्देशों का पालन किया और निर्धारित समय सीमा के भीतर EC आवेदन जमा कर दिए।
पर्यावरणीय मंजूरी आवेदनों की स्थिति
पीठ ने EC आवेदनों की वर्तमान स्थिति की समीक्षा करते हुए कहा कि:
- स्क्रीनिंग और स्कोपिंग प्रक्रियाएँ पूरी हो चुकी हैं,
- Terms of Reference (ToR) जारी किए जा चुके हैं,
- कई मामलों में सार्वजनिक परामर्श की आवश्यकता से छूट दी गई क्योंकि इकाइयाँ औद्योगिक क्षेत्रों में स्थित हैं,
- कुछ मामलों में सार्वजनिक सुनवाई पूरी हो चुकी है और केवल अंतिम मूल्यांकन शेष है।
आर्थिक एवं औद्योगिक महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला पहले से संचालित उद्योगों से जुड़ा है जोरू रोजगार सृजन, औद्योगिक उत्पादन, और आर्थिक गतिविधियों में योगदान दे रहे हैं।
अदालत ने पाहवा प्लास्टिक्स फैसले की टिप्पणी दोहराते हुए कहा:
“अर्थव्यवस्था में योगदान देने और सैकड़ों लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने वाली इकाई को केवल पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी न होने जैसी तकनीकी अनियमितता के कारण बंद नहीं किया जाना चाहिए।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट कियारू “ÞEx-post facto Environmental Clearance सामान्यतः लापरवाही से नहीं दी जानी चाहिए, लेकिन आर्थिक परिणामों की अनदेखी करते हुए कठोर तकनीकी आधार पर इसे अस्वीकार भी नहीं किया जा सकता।”
अदालत ने बंदी के दृष्टिकोण को खारिज किया
अदालत ने उन दलीलों को भी खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि Pahwa Plastics फैसला केवल उन इकाइयों पर लागू होता है जहाँ लगभग 8000 कर्मचारी कार्यरत थे। पीठ ने स्पष्ट किया कि पूर्व टिप्पणियाँ सामूहिक रूप से पूरे फॉर्मल्डिहाइड निर्माण क्षेत्र पर लागू होती हैं, जिनमें वर्तमान अपीलकर्ता इकाइयाँ भी शामिल हैं।
अदालत ने “deemed consent” से जुड़े आपत्तियों को भी खारिज किया और कहा कि इकाइयों को प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से Consent to Operate प्राप्त था।
महत्वपूर्ण रूप से अदालत ने कहा कि:
- उद्योग वैधानिक अनुमतियों के साथ संचालित हो रहे थे,
- और यह जानबूझकर पर्यावरणीय उल्लंघन का मामला नहीं था।
अंतिम फैसला
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“Ex-post facto Environmental Clearance ही वह उपयुक्त सुधारात्मक प्रक्रिया थी, जिसे संबंधित प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के निर्देशों के बाद शुरू किया गया।”
इसके अनुसार अदालत ने:
- NGT के बंदी आदेश निरस्त कर दिए,
- इकाइयों को संचालन जारी रखने की अनुमति दी,
- प्राधिकरणों को लंबित EC आवेदनों पर एक महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया,
- तथा जहाँ बिजली कनेक्शन काटे गए थे वहाँ बकाया भुगतान की शर्त पर पुनः बिजली आपूर्ति बहाल करने का आदेश दिया।
हालाँकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी इकाई का EC आवेदन अंततः उस इकाई के कारण हुए उल्लंघनों के आधार पर अस्वीकार होता है, तो प्राधिकरण कानून के अनुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
👇 Please Note 👇
Thank you for reading our article!
If you don’t received industries updates, News & our daily articles
please Whatsapp your Wapp No. or V Card on 8278298590, your number will be added in our broadcasting list.






Ply insight launched on March 2018 with a vision to make a platform to collaborate plywood MDF, Laminate, machinery manufactures with dealers in the Trade.
Categories
Useful Links
Follow Us