पश्चिम एशिया में संघर्ष एक महीने से अधिक खिंचने के कारण लघु, सूक्ष्म और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) की कार्यशील पूंजी ऋण की मांग बढ़ गई है। कच्चे माल खासकर रसायनों की बढ़ी हुई कीमतों और प्राप्तियों में देर होने की वजह से छोटे उद्योगों के नकदी प्रवाह पर दबाव बढ़ रहा है, जिससे बैंकों से कर्ज की मांग बढ़ गई है।

बैंकरों का कहना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का सबसे अधिक असर एमएसएमई पर पड़ने की आशंका है। वित्त वर्ष 2027 में बैंकों के ऋण पोर्टफोलियो की गुणवत्ता पर इसका दबाव दिखाई देगा। बैंकों का कहना है कि यह क्षेत्र प्रमुख चिंता का विषय बन सकता है।

हालांकि वित्तीय वर्ष के समापन के समय भी अक्सर प्रायः ऐसे ही रुझान देखे जाते हैं। पश्चिम एशिया युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने से कुछ क्षेत्रों पर गंभीर असर पड़ा है। विशेष रूप से पश्चिम एशिया के बाजारों पर निर्भर रहने वाले निर्यातक और आयातक दोंनों प्रभावित हो रहे हैं। साथ ही उर्वरक और रसायन जैसे क्षेत्रों को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

सामान्यतः जब कामकाज का स्तर कम होता है तो कार्यशील पूंजी की जरूरत बहुत ज्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन जब गतिविधियां सुस्त होती हैं, तो लागत को पूरा करना ज्यादा मुश्किल हो जाता है। अगले 6 से 12 महीनों में कुछ और दवाव देखने को मिल सकता है। मौजूदा हालात का पूरा असर शायद अप्रैल के आखिर या मई में दिखाई देगा, क्योंकि ऐसे असर सामने आने में थोड़ा समय लगता है।

बैंकरों के अनुसार कच्चे माल, माल ढुलाई और शिपिंग जैसे इनपुट लागत में वृद्धि चुनौती हो सकती है। साथ ही डीजल की कीमतें बढ़ने से घरेलू परिवहन लागत में संभावित वृद्धि हो सकती है। पैकेजिंग सामग्री की लागत पहले ही बढ़ चुकी है और प्लास्टिक तथा रसायन जैसे कच्चे तेल से जुड़े उद्योगों में लागत का दबाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है। इसके परिणामस्वरूप कार्यशील पूंजी की मांग बढ़ सकती है।

उदाहरण के लिए यदि इनपुट लागत 20 से 30 फीसदी बढ़ती है तो भले ही उत्पादन की मात्रा कम हो जाए मगर कुल पूंजी की आवश्यकता बढ़ सकती है।


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