पाकिस्तान, मिस्र, तुर्किये और सऊदी अरब द्वारा समझौता कराने के प्रयासों के बावजूद दोनों पक्षों (अमेरिका-इजरायल) तथा ईरान का अड़ियल रवैया, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी आर्थिक बोझ डालने वाला है। एशियाई देश, जो पश्चिम एशियाई जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भर है, मुद्रास्फीति के प्रभाव और ईंधन की कमी से उत्पन्न कठिनाइयों को नियंत्रित करने के लिए पहले से ही जूझ रहे हैं,।

होर्मुज स्ट्रेट से समुद्री तेल और गैस व्यापार का एक चौथाई हिस्सा होता है और यह पश्चिम एशियाई जीवाश्म ईंधन उत्पादकों का मुख्य मार्ग है। क्योंकि 80 से 90 फीसदी कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी मार्ग से आते हैं। सऊदी अरब ने नाकेबंदी का सामना करने के लिए अपने पूर्व-पश्चिम स्थलीय पाइपलाइन से लाल सागर के यनबू बंदरगाह तक तेल प्रवाह बढ़ाने की कोशिश की, जिससे कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हुआ। लेकिन अब वह मार्ग भी खतरे में है।

स्वेज नहर/लाल सागर भी अब निशाने पर है, जो दुनिया के कंटेनर यातायात का एक-तिहाई हिस्सा संभालता है, और दुनिया पहले ही 2023 और 2024 में हूती व्यवधानों का असर देख चुकी है। जहाजों को अफ्रीका के पश्चिमी तट से नीचे और केप ऑफ गुड होप के चारों ओर लंबा मार्ग लेना पड़ा, जिससे शिपिंग लागत, बीमा प्रीमियम सहित, तेजी से बढ़ गई और वैश्विक मुद्रास्फीति दबाव तथा आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और गहरा गया।

यह लगातार स्पष्ट होता जा रहा है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान की प्रतिक्रियाओं और क्षमताओं का गंभीर रूप से गलत आकलन किया है। ईरान के राजनीतिक और सुरक्षा नेतृत्व की हत्या ने भी उसे आत्मसमर्पण करने के लिए प्रेरित नहीं किया।

अमेरिका और इजरायल के लिए सम्मानजनक निकास का रास्ता न मिलने से पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की संभावना लगातार दूर होती जा रही है।


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