कई नीति निर्धारकों और विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और चीन के बीच छिड़ा व्यापार युद्ध भारत के लिए सुनहरा मौका है। आपूर्ति श्रृंखला बिगड़ने और भू-राजनीतिक तनाव गहराने पर क्या भारत निर्यात बाजार में चीन की भारी हिस्सेदारी अपने नाम कर पाएगा? ऊपर से तो ऐसा ही दिख रहा है। किंतु इस उम्मीद के पीछे कड़वी हकीकत भी है।

चीन का निर्यात तंत्र काफी विशाल है। उसने 2024 में अमेरिका को 439 अरब डॉलर का माल सीधे निर्यात किया। इन आंकड़ों में वियतनाम, कंबोडिया और मेक्सिको के रास्ते निर्यात माल जोड़ दें तो आंकड़ा बहुत बढ़ जाएगा।

इस भारी भरकम आंकड़े की बराबरी करना आसान नहीं है। भारत और दूसरे देशों के पास इतनी औद्योगिक मजबूती, लॉजिस्टिक्स क्षमता या नीतिगत पारदर्षिता नहीं है कि वे चीनी निर्यात का विकल्प बन सकें।

मगर मुद्दा यह है कि भारतीय माल उसमें दाखिल होने लायक है भी या नहीं।

भारत का विनिर्माण क्षेत्र बिखरा है, तकनीक के इस्तेमाल में पीछे है और चीन से खाली हुई जगह भरने को पूरी तरह तैयार नहीं है। वस्तुओं एवं उत्पाद की गुणवत्ता सबसे बड़ी बाधा है। भारतीय उत्पाद अक्सर अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर नाकाम रहते हैं और उत्पादन भी नहीं बढ़ पाता।

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निर्यातकों के लिए भी चुनौती हैं। भारतीय निर्यातकों को लंबी-चौड़ी कागजी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। लॉजिस्टिक के कारण माल की आवाजाही सुस्त तथा खर्चीली बन जाती है, जिससे निर्यातक आपूर्ति से जुड़ी शर्तें पूरी करने में जूझते रहते हैं। सड़क और रेल संपर्क खराब होने के कारण समुद्र में दूर के राज्यों से माल बंदरगाह तक पहुंचना दूभर हो जाता है। जो अन्य देशों में लगने वाले समय की तुलना में तीन गुना है।

भारत निर्यात में आगे बढ़ना चाहता है मगर आयात पर निर्भर होता जा रहा है खास तौर पर चीनी उत्पादों पर।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में होड़ करने के लिए लंबे समय तक धैर्य और कड़ी मेहनत की जरूरत होती है। इसलिए विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा में निवेश, व्यावसायिक शिक्षा में सुधार, कारोबार सुगमता के लिए शर्तें घटाना, अप्रत्यक्ष करों में कमी करना, प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना, निर्यात क्षेत्र में उभरती इकाइयों को समर्थन देना और सार्थक तकनीकी हस्तांतरण के साथ लगातार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना होगा।

 

सुरेश बाहेती

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