वर्तमान सरकार ने भारत को सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार के साथ दुनिया की दूसरी बड़ी फैक्टरी भी बना दिया है। स्वदेशी जैसे लक्ष्य को पाने में मेक इन इंडिया और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) समेत अन्य योजनाओं ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन, इनका ज्यादा फायदा विदेशी ब्रांड उठा रहे हैं। स्वदेशी कंपनियां दौड़ में पीछे हो रही हैं।

सरकार की कोशिशों का ही नतीजा है कि भारत उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और स्मार्टहोम अप्लायंसेज के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बन गया है। यह बाजार उपभोक्ता के साथ विक्रेता के रूप में भी स्थापित हो चुका है।

2014-15 में मोबाइल का घरेलू उत्पादन महज 18,000 करोड़ रुपये का था, जो 2024-25 में 28 गुना बढ़कर 5.45 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। इसमें सबसे बड़ी भूमिका पीएलआई की रही है।

आंकड़े यह भी बताते हैं कि इस योजना का सबसे ज्यादा लाभ विदेशी ब्रांडों को मिला है। कंज्यूमर ड्यूरेबल और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में ताइवान, दक्षिण कोरिया एवं चीन के ब्रांड सरकारी नीतियों का सबसे ज्यादा लाभ उठा रहे हैं। ऐसे में भारतीय विनिर्माता अपने ही बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते। स्वदेशी कंपनियां इन योजनाओं का उतना बेहतर तरीके से लाभ नहीं उठा पातीं।

यह सब बौद्धिक संपदा और ब्रांडों के तहत हो रहा है, जिनका मालिकाना हक भारत के पास नहीं है। इसका मतलब है कि ये भविष्य सुरक्षित नहीं हैं, क्योंकि ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां बेहतर लागत मिलने पर अन्य देशों की ओर अपनी विनिर्माण क्षमता मोड़ सकती हैं।

भारत को दुनिया का विनिर्माण केंद्र बनाने का एकमात्र तरीका भारतीय ब्रांड को मजबूत करना है, जो न सिर्फ भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिस्पर्धा कर सकें।

पीएलआई योजना से जुड़ी भारतीय कंपनियों का कहना है कि वे विदेशी ब्रांड को बाहर करने की मांग नहीं कर रही हैं। इसके बजाय वे अपने लिए प्राथमिकता, समान अवसर और घरेलू मूल्यवर्धन का निष्पक्ष मूल्यांकन चाहती हैं।