रुपये ने 12 अक्टुबर को 0.99 फीसदी की बढ़त दर्ज की और रुपया 95.78 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। जो 2 अप्रैल 2026 के बाद एक दिन की सबसे बड़ी बढ़त है। पिछले कारोबारी सत्र में यह 96.74 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। यह तेजी घोषित किए गए ताजा उपायों के बाद आई है। इनमें सरकारी तेल विपणन कंपनियों के लिए रोजाना डॉलर उपलब्ध कराने की विशेष व्यवस्था भी शामिल है।

इससे पहले 2 अप्रैल को रुपये एक कारोबारी सत्र में करीब एक फीसदी बढ़त दर्ज की गई थी। उस समय रिजर्व बैंक ने बैंकों को निवासी और अनिवासी ग्राहकों के लिए रुपये में नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड सौदों की पेशकश करने से रोक दिया था। यह कदम केंद्रीय बैंक के उस फैसले के बाद उठाया गया था जिसमें घरेलू बाजार में बैंकों के शुद्ध ओपन पोजिशन को 10 करोड़ डॉलर तक सीमित कर दिया गया था। इससे बैंकों को अपनी पोजिशन घटानी पड़ी और डॉलर बेचने पड़े।

इन उपायों से यह बदलाव होता है कि डॉलर कब और कहां खरीदे जाएंगे। मगर तेल, व्यापार और पूंजी के बाहर जाने से पैदा होने वाली बुनियादी मांग में बदलाव नहीं होता।

साथ ही अधिकृत डीलरों को 20 लाख डॉलर से अधिक के सांकेतिक मूल्य वाले रुपये से जुड़े प्रत्येक विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंध के लिए उसके रुपये मूल्य के 20 फीसदी के बराबर राशि आरबीआई के पास नकद के रूप में रखनी होगी। उम्मीद है कि डेरिवेटिव कारोबार पर अंकुश लगाने या उसकी लागत बढ़ाने से सट्टेबाजी कम होगी और रुपये पर कुछ दबाव घटेगा। हालांकि ये उपाय अस्थायी समाधान हैं और मूल समस्या का समाधान नहीं करेंगे। हो सकता है, इनसे विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव के लिए हेजिंग करने वाले वास्तविक कारोबारों को नुकसान पहुंच सकता है।

वास्तव में रिजर्व बैंक रुपये को सहारा देने के लिए मुद्रा बाजार में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप कर रहा है। रियायती स्वैप व्यवस्थाओं से, जिनमें विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक), यानी एफसीएनआर (बी) जमाओं से जुड़ी व्यवस्थाएं भी शामिल हैं, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने में मदद मिली। केंद्रीय बैंक की घोषित नीति है कि वह रुपये के किसी निश्चित स्तर को लक्ष्य नहीं बनाता और केवल अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करता है। लेकिन ऐसा लगता है कि वह अन्य उद्देश्यों पर भी नजर रख रहा है।

यह रेखांकित करना जरूरी है कि भुगतान संतुलन पर पड़ने वाले दबाव से निपटना केवल केंद्रीय बैंक की जिम्मेदारी नहीं है। भारत को चालू खाते और पूंजी खाते दोनों पर दबाव का सामना करना पड़ रहा है और यह दबाव ईरान युद्ध से पहले से ही मौजूद है। पिछले दो वर्षों में भारत को भुगतान संतुलन में घाटे का सामना करना पड़ा, जिसका एक कारण पूंजी का बाहर जाना था। इस वर्ष एफसीएनआर (बी) के तहत मजबूत पूंजी प्रवाह के कारण भुगतान

संतुलन में अधिशेष रहने की संभावना है। हालांकि एफसीएनआर (बी) से होने वाला पूंजी प्रवाह भी केवल अल्पकालिक राहत देगा।

आरबीआई की हालिया कार्रवाई से संकेत मिलता है कि इससे भी उतनी मदद नहीं मिल रही है जितनी कई लोगों ने उम्मीद की थी। अब संभवतः उपाय यही है कि रुपये को कमजोर होने दिया जाए। हालांकि इससे स्थिति में बुनियादी सुधार तभी होगा जब भारतीय निर्यातक कमजोर मुद्रा का लाभ उठाने में सक्षम हों।

इसके लिए सरकार को शुल्क से जुड़े सुधारों सहित जरूरी सुधार लागू करने होंगे। इसके अलावा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए अनुकूल परिस्थितियां भी तैयार करनी होंगी। ऐसे संरचनात्मक सुधारों के बिना, रुपये को सहारा देने वाले उपायों से शायद केवल कुछ समय के लिए ही राहत मिलेगी।


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