देसी बाजार पर केद्रित भारत के कदम
- अगस्त 8, 2025
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अर्थशास्त्री यह ध्यान दिलाने से कभी नहीं चूकते कि निर्यात में मजबूत तेजी के बगैर कोई भी अर्थव्यवस्था 7 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर बरकरार रखने में कामयाब नहीं रही है।
दुनिया भर में नीतियों का केंद्र बदल गया है और अब नीतियां बनाते समय देश के भीतर उद्योगों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। मुक्त व्यापार, पूंजी तथा तकनीक की बेरोकटोक आवाजाही वाली वैश्वीकृत दुनिया से साझा फायदों के वायदे और नियमों की पवित्रता का दौर शायद अतीत बन गया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है मगर हकीकत है। भू-राजनीतिक विभाजन और वैश्वीकरण की उलटबांसी पिछले कुछ साल में साफ देखी जा सकती है।
बहरहाल निर्यात अगर वृद्धि का इंजन नहीं हो सकता तो भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 8 फीसदी सालाना दर से कैसे बढ़ेगा, जबकि 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए ऐसा होना जरूरी है।
2024-2025 की आर्थिक समीक्षा इसका जवाब देती हैः भारत को देश के भीतर के बाजारों पर अधिक निर्भर रहना होगा और निर्यात पर कम। तभी आने वाले वर्षों में वृद्धि को गति मिल सकेगी। परंतु बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे 8 फीसदी सालाना वृद्धि दर वाकई हासिल हो सकेगी?
आने वाले सालों में दो कारणों से अंतर्मुखी या देश के भीतर की ओर रूझान बना रहेगा। पहली वजह है विश्व व्यापार में आता धीमापन। शुल्क तो हर जगह कम हुए हैं मगर देशों ने शुल्क के अलावा दूसरी बाधाएं तैयार कर दी हैं, जो व्यापार में अड़चन डालती हैं।
टंªप के शुल्क और दूसरे देशों की ओर से लगने वाले जवाबी शुल्क मुक्त व्यापार की राह में मौजूद अड़चनों को एकदम नए स्तर तक ले जा सकते हैं। आयात में कटौती करने और आयात होने वाले सामान को देश के भीतर ही बनाने की यह भी एक ठोस वजह होगी।
भारत में घरेलू उत्पादन पर निर्भरता की तीसरी बड़ी वजह यह है कि हमें चीन पर निर्भरता कम करनी है। समीक्षा कहती है, ‘कई उत्पाद केवल एक ही जगह से मंगाए जाएंगे तो आपूर्ति श्रृंख्ला बिगड़ने, दाम ऊपर-नीचे होने और मुद्रा को जोखिम होने पर भारत के सामने खतरा आ सकता है।‘
समीक्षा में देश के भीतर आपूर्ति श्रृंख्ला को मजबूत बनाने और आपुर्ति के वैकल्पिक स्त्रोत तलाशने की बात शामिल है चाहे वे स्त्रोत किफायती न हों। उसमें कहा गया है कि सबसे कम कीमत पर सामग्री लेकर निर्यात बाजार में होड़ करना ही हमेशा प्राथमिकता नहीं होती।
आज के दौर में आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही तय किया जाता है कि कच्चा माल कहां से मंगाना है। और यह विचार केवल भारत का ही नहीं है।
उदारीकरण के बाद के दौर में एक मंत्र यह रहा है कि संरक्षणवाद या उच्च शुल्क से वृद्धि को नुकसान पहुंचता है। मगर इस बार की समीक्षा कहती है कि संरक्षणवाद इतना बुरा भी नहीं है। चुने गए औद्योगिक समूहों द्वारा चुने गए क्षेत्रों में वृद्धि को बढ़ावा देने वाली औद्योगिक नीति का दौर एक बार फिर आ गया है।
दूसरे देशों की तरह भारत की आर्थिक नीति भी पिछले कुछ वर्षों से देसी उद्योगों पर केंद्रित होती जा रही है। सरकार ने मार्च 2020 में उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहनों की योंजना (पीएलआई) पेश की, जिसका मकसद आयात पर ऊंचे शुल्क और सब्सिडी के जरिये देसी उत्पादन बढ़ाना था।
भारत में देसी सामग्री के इस्तेमाल के नियम कहते हैं कि कुछ खास परियोजनाओं में एक खास सीमा तक देसी पुर्जे ही इस्तेमाल करने पड़ते हैं। साथ ही सरकारी खरीद में भी देसी उत्पादकों को तरजीह दी जाती है।
आलोचकों ने इन्हें सूधार विरोधी कदम कहा था, मगर आज तो ये बहुत दूरदर्शी कदम लग रहे हैं।
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