भारत की जलवायु संकट में ‘पैरामेट्रिक बीमा’ दे सकता है मजबूत सहारा
- अगस्त 11, 2025
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जैसे-जैसे प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही है। कभी भी और कही भी प्राकृतिक आपदा आ जाती है। ऐसे में अब समझा जा रहा है कि पारंपरिक बीमा मॉडल पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे में ‘पैरामेट्रिक बीमा‘ एक वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करता है।
कुछ ही दिनों में हिमाचल प्रदेश में 20 से अधिक बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएँ हुईं, जिनमें जान-माल का भारी नुकसान हुआ और राज्य का आधारभूत ढांचा प्रभावित हुआ। इस प्रकार की मौसम संबंधी घटनाएं लगातार बढ़ रही है।
भारत ने 1900 से अब तक 764 बड़ी प्राकृतिक आपदाएँ झेली हैं, जो दुनियाभर में किसी भी देश से अधिक है। विश्व बैंक के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से भारत को 2030 तक हर साल $56 अरब का आर्थिक नुकसान हो सकता है।
ऐसे में समाधान क्या है?
यहाँ पैरामेट्रिक बीमा एक नया विकल्प बनकर उभरा है।
क्या है पैरामेट्रिक बीमा?
पारंपरिक बीमा में नुकसान का आकलन और मुआवज़ा तय करने में समय लगता है। पैरामेट्रिक बीमा में यह प्रक्रिया तेज़ और डेटा-आधारित होती है।
बीमा की शर्तों में पहले से तय कर दिया जाता है कि यदि कोई विशेष मौसमीय सीमा (जैसे बारिश की मात्रा, हवा की गति आदि) पार हो जाए, तो बीमा राशि तुरंत जारी कर दी जाएगी।
इसमें डेटा स्रोत जैसे कि मौसम विभाग, नासा या अन्य सैटेलाइट आधारित प्रणाली का उपयोग होता है।
उपयोग के क्षेत्रः
यह बीमा कृषि, परिवहन, मैन्युफैक्चरिंग, पशुपालन जैसे क्षेत्रों में उपयोगी है, जहाँ देरी से मुआवज़ा मिलने से वित्तीय संकट गहरा सकता है।
बिजली संयंत्रों, सौर ऊर्जा पार्कों, और अन्य जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों के लिए यह एक व्यावहारिक विकल्प बन रहा है।
वैश्विक अनुभवः
अफ्रीका, पैसिफिक द्वीप, और यूके जैसे देशों में यह बीमा बाढ़, सूखा और तूफानों से बचाव के लिए इस्तेमाल हो रहा है।
भारत में ज़रूरत क्यों?
भारत में बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि, और अत्यधिक गर्मी जैसे खतरे बढ़ रहे हैं।
किसानों और सूक्ष्म उद्यमियों के लिए यह बीमा सुरक्षा कवच बन सकता है, जिससे नुकसान होते ही राहत राशि मिल सके।
भविष्य की दिशाः
2024 में भारतीय बीमा नियामक प्राधिकरण ने पैरामेट्रिक बीमा को बढ़ावा देने के लिए कई सुझाव दिए हैं।
अब आवश्यकता है पारदर्शी डेटा, कम लागत वाली पॉलिसियों, और जागरूकता की, ताकि इस बीमा मॉडल को देश भर में लागू किया जा सके।
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