वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) हाल के वर्षों की प्रमुख नीतिगत निर्णयों की सफलताओं में से एक रही है। जिसने देश के कर व्यस्वस्था को तर्कसंगत बनाया। और पहले से चले आ रहे कर व्यस्वस्था के खराब ढांचे को दुरूस्त किया है। जिससे देश के बाजार का सही मायने में विकास हुआ है।

अब सवाल है कि वास्तव में सरकार को जीएसटी से कितना राजस्व प्राप्त हुआ है? क्या वास्तव में जीएसटी-पूर्व व्यवस्था में सुधार है?

हैरान करने वाले हैं। अध्ययनों के अनुसार, 2022-23 में जीएसटी आंकड़ा ₹ 18.1 ट्रिलियन है, जो सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी के 6.6 प्रतिशत के बराबर है। लेकिन यह आंकड़ा वास्तव में जीएसटी कितना आया, इसका पैमाना है, इसे सरकारी राजस्व नहीं माना जा सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जीएसटी की कुछ राशि करदाताओं को वापस होती है। यह राशि कितनी वापस की गई, इसके आंकडे नहीं है।

एक बड़ा अपवाद है, जीएसटी में, निर्यात शून्य-रेटेड है, जिसका अर्थ है कि निर्यातक अपने उत्पादन पर कर का भुगतान नहीं करते हैं, लेकिन अपने इनपुट पर भुगतान किए गए कर पर रिफंड के हकदार हैं। यह जीएसटी के तहत रिफंड का बड़ा हिस्सा है।

क्या यह तथ्य कि जीएसटी राजस्व हाल ही में प्री-जीएसटी स्तरों को पार कर गया है, बिल्कुल नहीं। राजस्व में दो कारणों से गिरावट आई है। पहला कारण यह है कि पिछली व्यवस्था की तुलना में जीएसटी के साथ निर्यात रिफंड बहुत आसान, तेज और पूरी तरह से हो गया है। यह निश्चित रूप से एक अच्छी बात है, लेकिन शायद इसका स्वागत नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, महामारी से पहले के वर्षों में कर की दर में कटौती की होड़ लगी थी। जिससे औसत संग्रह दर मई 2017 में 14.4 प्रतिशत से घटकर सितंबर 2019 में 11.6 प्रतिशत हो गई।

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परिणामस्वरूप, अब हमें जीएसटी संग्रह बढ़ाने को ओर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। लेकिन यह काम न तो अति उत्साह में करना है न ही करदाताओं को परेशान करना है। जरूरत इस बात की है कि जो प्रमुख खामियां है, उन्हें दूर किया जाए। दर संरचना को सरल बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि वर्तमान जटिलता, विशेष रूप से उपकरों के संदर्भ में संभवतः राजस्व संग्रह को कम कर रही है।

सबसे स्वाभाविक परिवर्तन 18 प्रतिशत की मानक दर, 10 प्रतिशत की निचली दर के साथ तीन-दर संरचना (2015 में राजस्व तटस्थ दर (आरएनआर) समिति द्वारा अनुशंसित) की ओर बढ़ना होगा। जीएसटी मुआवजा छोड़ अब अनावश्यक उपकरों को 40 प्रतिशत की शीर्ष दर पर सामान्य दर संरचना में शामिल किया जाना चाहिए। इससे न केवल प्रणाली सरल बनेगी, बल्कि एक बड़ी खामी भी दूर होगी। जिससे राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत करों के मानक विभाज्य संग्रह से दूर हो गया है जो केंद्र और राज्यों दोनों के लिए संसाधन प्रदान करता है।

निष्कर्ष इस प्रकार हैं

जीएसटी ने शुरुआती वर्षों में जितना हमने सोचा था उससे कम अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन अब यह हमारी उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। यदि इसे सरलता की दिशा में पुनः डिजाइन किया जाता तो यह और भी बेहतर कर सकता था। यदि रिफंड डेटा (और उनकी संरचना) प्रकाशित किया जाए तो इस ऐतिहासिक सुधार के बारे में हमारी सराहना और समझ में सुधार होगा।


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