प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 सितंबर को 73,000 करोड़ रुपये का पश्चिमी समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी) राष्ट्र को समर्पित किया और इसके साथ ही भारत के अधोसंरचना इतिहास का 20 साल पुराना एक अध्याय समाप्त हुआ। यह कॉरिडोर 2,800 किलोमीटर में विस्तारित है और इसने तीन प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देखा।

उत्तर प्रदेश के दादरी को जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह प्राधिकरण (जेएनपीए) से जोड़ने वाली यह परियोजना भारतीय रेल के अलग-अलग मार्गों से आने वाली एक ट्रेन की तुलना में 60 फीसदी समय बचाएगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि इससे कंटेनर कार्गो में 25 फीसदी की लागत बचेगी। ट्रेन से फिलहाल यह वचत करीब 6-7 फीसदी है।

पंजाब और बिहार से बना पूर्वी डीएफसी अक्टूबर 2023 में पूरा हुआ था और इसमें 51,000 करोड़ रुपये की लागत आई थी। दोनों कॉरिडोर की लागत पूरी होने पर लगभग 1.24 लाख करोड़ रुपये रही। प्रारंभिक योजना में अंतिम लागत का केवल छठा हिस्सा अनुमानित था।

सरल समझ के लिए, पश्चिमी कॉरिडोर को अक्सर औद्योगिक कॉरिडोर कहा जाता है. जो मुंद्रा, कांडला, पिपावाव और जेएनपीए जैसे प्रमुख बंदरगाहों तथा विभिन्न उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी औद्योगिक शहरों से जुड़ता है।

अधिकारियों के मुताबिक पश्चिमी डीएफसी पर 100 किलोमीटर की दूरी तय करने में औसतन लगभग 2 घंटे 30 मिनट लगते हैं जबकि सामान्य रेलवे ट्रैक पर यही दूरी लगभग छह घंटे में पूरी होती है।

पश्चिमी कॉरिडोर का अधिकांश हिस्सा कुछ वर्ष पहले ही पूरा हो चुका था लेकिन जेएनपीए (महाराष्ट्र) से जोड़ने वाला अंतिम महत्त्वपूर्ण हिस्सा विलंबित हो गया था।

इसके पूरा होने से सरकारी जेएनपीए को वह लाभ होगा जो उसके प्रतिस्पर्धी निजी बंदरगाह यानी मुंद्रा और पीपावाव बीते कुछ सालों से उठा रहे हैं।

30 जून को इसका परीक्षण हो चुका है और अब यह कॉरिडोर करीब एक महीने से परिचालित है।

कंटेनर ट्रेन ऑपरेटर जिन्हें जेएनपीए से जुड़ाव और कॉरिडोर के पूरा होने से सबसे बड़ा लाभ मिलने वाला है वे इस कदम का स्वागत कर रहे हैं। फिर भी कॉरिडोर की दक्षता और इससे होने वाली वास्तविक बचत को लेकर चिंताएं बरकरार हैं।

यद्यपि लागत बचत लगभग 6-7 प्रतिशत ही है क्योंकि ऊपरी स्टैक पर लोड किए गए कंटेनर के लिए निचले स्टैक वाले बॉक्स की कीमत का 50 प्रतिशत शुल्क लिया जाता है।