मेलामाइन पर DGTR द्वारा प्रस्तावित 250% तक की एंटी डेपिंग ड्यूटी ने लेमिनेट उद्योग सहित संपूर्ण प्लाईवुड और पेनल उद्योग में हलचल मचा दी है। हालांकि इस प्रस्ताव को फिलहाल वित्त मंत्रालय की स्वीकृति का इंतजार है। लेकिन उद्योग जो पहले से ही फेनोल यूरिया आदि रसायनों की बढ़ी हुई कीमतों से परेशान है, DGTR के इस प्रस्ताव से अपनी लागत पर होने वाले प्रभाव का आकलन करने में लग गया है।

भारत में सिर्फ GSFC ही मेलामाइन उत्पादक है, जो भारत की कुल खपत का 20 प्रतिशत ही भरपाई कर पा रहा है, जिससे उद्योग को अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत मेलामाइन आयात से पूरा करना पड़ता है।

ऐसे में, उद्योग का तर्क है कि एक कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सभी MSME की लागत बढ़ाने का काम करने जा रही है, जो अनुचित है।

इस संदर्भ में FIPPI की अगुवाई में सभी संगठनों ने वित्त मंत्रालय को ईमेल के माध्यम से अपना विरोध प्रकट किया है। जैसे ILMA;HPMA;PPMA;SOPMA;AIPLI; SIPMA; DNPMAI; WBIA-UP; PMWA-UP

प्रमुख तर्क

  1. एक उत्पादक बनाम हजारों उपयोगकर्ताः गुजरात सरकार द्वारा प्रवर्तित कंपनी GSFC मेलामाइन की एकमात्र घरेलू उत्पादक है। इसके विपरीत, हजारों प्लाइवुड, लैमिनेट, MDF, पार्टिकल बोर्ड और रेजिन इकाइयाँ, जिनमें अधिकांश MSME हैं और जिनमें लाखों श्रमिक कार्यरत हैं, इस कच्चे माल पर निर्भर हैं। केवल एक उत्पादक की रक्षा के लिए इन सभी की लागत बढ़ाना उचित नहीं है।
  2. GSFC क्षतिग्रस्त पक्ष नहीं हैः मेलामाइन GSFC के अनेक उत्पादों में से केवल एक है। वित्त वर्ष 2025-26 के परिणामों के अनुसार, कंपनी का परिचालन राजस्व ₹10,827 करोड़ और शुद्ध लाभ (PAT) ₹652 करोड़ रहा (14 प्रतिशत की वृद्धि)। इसके इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स सेगमेंट का EBIT ₹56 करोड़ से बढ़कर ₹200 करोड़ हो गया, जो चार वर्षों में सर्वाधिक है। GSFC बेहतर मूल्य प्राप्ति के लिए मेलामाइन के निर्यात को भी बढ़ावा दे रही है।
  3. घरेलू आपूर्ति मांग को पूरा नहीं कर सकतीः GSFC की मेलामाइन-प्ट लाइन की क्षमता 40,000 TPA है, जबकि भारत ने अकेले 2024 में चीन से 1,00,000 MT से अधिक मेलामाइन का आयात किया। शुल्क इस अंतर को नहीं भर सकता, बल्कि केवल लागत बढ़ाएगा। बताया गया है कि ळैथ्ब् ने पिछली कार्यवाहियों में आपत्ति उठाने वाले डाउनस्ट्रीम निर्माताओं को आपूर्ति देने से मना कर दिया था, इसलिए एकमात्र आपूर्तिकर्ता ‘‘द्वारपाल‘‘ भी बन सकता है।
  4. शुल्क से विदेशी प्लाइवुड को लाभ होगाः विश्व के मेलामाइन व्यापार में चीन की हिस्सेदारी 60% से अधिक है, जिसमें वियतनाम, इंडोनेशिया और मलेशिया को आपूर्ति भी शामिल है, जो भारत को प्लाइवुड और पैनल के मुख्य निर्यातक हैं। इन देशों के निर्माता सस्ता मेलामाइन खरीदते रहेंगे, जबकि भारतीय निर्माताओं को 50-60% अधिक कीमत चुकानी होगी। परिणामस्वरूप, अक्सर रियायती FTA शुल्क पर आने वाले सस्ते आयातित प्लाइवुड, लैमिनेट और पैनल भारत में बाढ़ की तरह आ जाएंगे और भारतीय इकाइयाँ घरेलू व निर्यात, दोनों बाजार खो देंगी। यह एक उलटी शुल्क संरचना (inverted duty structure) है, जो ‘‘मेक इन इंडिया‘‘ को नुकसान पहुँचाती है।
  5. क्षति और कारणता सिद्ध नहीं:
  • कीमतों में कटौती (price undercutting) नकारात्मक है।
  • GSFC की घरेलू और निर्यात कीमतें लगभग समान रूप से गिरीं, जो वैश्विक मूल्य चक्र को दर्शाता है।
  • आधार वर्ष 2021-22 एक शिखर (peak) वर्ष था।
  • उत्पादन में गिरावट दो पुराने संयंत्रों (कुल 15,000 MT) के बंद होने के समय ही हुई।