Editorial

Up till now, plywood industry of Yamunanagar, U.P. and Punjab is known for its quality. Whole industry has seen lots of ups & down. They never compromised in the quality (of raw material). Whatever the circumstances was there.

It is reminded that when a dealer required furniture grade ply he has to move to other areas. Ardu is used in different areas of Haryana including Rajasthan since long. And now, for the first time it has entered the area of yamunanagar. It is defamed due to its behavior of producing powder at very short interval.

Any timber soft or hard, have larva orgerms of insecticide. Soft wood is more prone to develop speedily in temperature. Ardu is of the same nature. It is the produce of Rajasthan. But good manufacturers of Rajasthan also avoided using it.

We know that having developed the powder problem in plywood, it affects all material which are stacked nearby, be it MR or BWR, popular or pine. Mango simul Kadam have same problems, subject to its variety. Mango, Kadam produced in some area are not vulnerable to the problem. And if seasoned and treated properly.

If one sells telling the produce of Ardu. With information to its dealers there is no problem, then it will be sold in the same way (furniture grade) upto end consumers. Main problem is if we use it in our main product without informing our dealers, it will create havoc. It will affect the whole scenario in long run.

There are some manufacturers who do their business not as industry, but as short term work. They do not have any ethics. Just thinking of present profit/gain scarifying the whole industry is not a good idea. We may come to power (imagine our political situation) and generate projects. Ultimately, people power is almighty.

 

अब तक यमुनानगर और पंजाब एवं उत्तर प्रदेश को इसकी क्वालिटी के लिए जाना जाता रहा है। इतने सालों में इतने उतार-चढ़ाव आये, सभी को इसने झेला है। जब भी किसी भी क्षेत्र के डीलर को सस्ते माल (फर्नीचर ग्रेड) की जरूरत हुई उसने दूसरे इलाके को प्लाई लेकर अपना काम चलाया। एक भरोसा था सभी को कि माल सस्ता भी अगर लेंगे तो भी यहां (राॅ-मेटेरियल की) क्वालिटी से समझौता नहीं होगा।

अरडु की लकड़ तो बीसों साल से इस्तेमाल हो रही है। राजस्थान के अलावा हरियाणा और यू0पी0 के कुछ ही स्थानों में इसका व्यापक रूप से इस्तेमाल हुआ करता था।

लेकिन अब इसने इस मंदी के दौर में यमुनानगर में भी अपनी पैठ बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है।

जिन उद्योगपतियों ने तात्कालिक लाभ के लिए अरडु को पनाह दी है वह नहीं समझ पा रहे कि भविष्य में इसका कितना बड़ा नुकसान यमुनानगर को झेलना पड़ सकता है। यहां की विश्वसनीयता ही खतरे में पड़ सकती है।

तत्काल में तो हम यही कह सकते हैं कि जिस फैक्ट्री में एक बार अरडु का माल बनाने की छाप लग गयी, फिर उससे उबरना उसके लिए करीब-करीब नामुमकिन हो जायेगा।

प्रत्येक लकड़ के अन्दर चाहे वो ेवजि हो या ींतक, कीड़े का लार्वा होता ही है। ेवजि लकड़ में यह वापस समय पाकर बड़ा हो जाता है और घुन लगाने की शिकायत हो जाती है। जितनी अधिक गर्मी होगी उसमें इसके फलने-फुलने की क्षमता बढ़ जाती है। अरडु जो पैदा होता ही है राजस्थान में, इसी किस्म की लकड़ी है। जब इसमें एक बार यह शिकायत हो जाए तो उसके बाद इसके साथ आप कोई सा भी माल रख दें, चाहे वह पोपलर का हो या पाइन का- डत् का रख दें या ठॅत् का, इसने सबको तहसनहस कर देना है।

कदम, सीमुल, भी इसी तरह की लकड़ है। आम में भी जैसे कई प्रजातियां आती हैं। मीठे आम की अलग होती है। यू.पी. के आम की लकड़ में यह दुर्गुन नहीं है। वहीं गुजरात के कुछ इलाके के आम में यह तकलीफ है।

अरडु के माल को कह कर अगर बेचा जाये तो हर कोई उसे उसी तरह का माल बनाने वाले को बेचकर अपने आपको खाली रखता है। अगर किसी ने ए ग्रेड माल में इसे लगाकर, बिना अपने डीलर को बताए, माल देना शुरू कर दिया तो बाजार उसे अपने तरीके से ठीक कर लेगा।

आज से 15-20 साल पहले यमुनानगर के ही एक बड़े फैक्ट्री की 20-25 गाड़ी राजस्थान में बिका करती थी। और तब इस अरडु की वजह से उनको दिक्कत आनी शुरू हुई और अब उनका राजस्थान का व्यापार एक-दो गाड़ी में सिमट गया।

जब भी किसी ने अपनी क्वालिटी से समझौता किया है उसक मुनाफा एक बार तो जंप कर सकता है लेकिन आखिरकार बेलेन्स सीट सब की ठीक हो ही जाती है। सिर्फ समय की बात है।

सकुन के लिए काम करें-सकुन से करें। कमाई कम अधिक तो लगी रहेगी। सिर्फ दिमाग से काम न करें। दिल भी अपने काम में दे।